मंड़ल व कमंड़ल में राजनीति व राष्ट्रनीति का अंतर निहीत है - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)

वर्ष 1990 में मंड़ल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों को 27 प्रतिशत का आरक्षण देने के लिए एक राजनीतिक कदम उठाया क्योंकि तभी भाजपा के प्रमुख राजनेता लाल कृष्ण आड़वाणी ने आयोध्या में रामजन्म भूमि मंदिर के निर्माण के लिए गत कई दशकों से एक बहुत सोची समझी गई राष्ट्रनीति के तहत सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा का एक संकल्प लिया था। आड़वाणी की रथ यात्रा देश में राष्ट्र भावना को जागृत करते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सुत्र में पिरोने के लिए उठाया गया कदम था तथा यह एक राष्ट्रीय कार्य था क्योंकि यह महसूस किया जा रहा था कि जनमानस बाबरी ढ़ांचे को लेकर एक प्रकार की गुलाम व हीन भावना से गृस्त है। उसका तत्कालीन राजनीतिक महत्व नहीं था, न ही उससे भाजपा को रामजन्म भूमि मंदिर मन जाने से कोई राजनीतिक लाभ होता परन्तु भाजपा के इस अभियान को जिस प्रकार विपक्ष ने मुद्दा बनाया जिससे उनकी राजनीतिक कुर्सी हिलती सी लगी तो उन्होंने कुर्सी बचाने व अपने अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने के लिए केन्द्र सरकार के संकेत पर 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आड़वाणी का रथ रोक दिया और वहां के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने यह दिखाने की कोशिश की कि यह मुस्लिम विरोधी कृत्य है और हम (गैर भाजपा राजनीतिक दल) पूर्ण रुप से मुसलमानों के साथ है। हम हर कीमत पर मुसलमानों को संतुष्ट करेंगे।

तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सात अगस्त 1990 को मंड़ल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया क्योंकि इसमें उन जातियों को आरक्षण मिलने वाला था जो मुख्यतः ग्रामीण तथा खेतिहार समुदाय की थी क्योंकि लाल कृष्ण आड़वाणी को मात्र भारतीय जनता पार्टी का नेता मानते हुए उनको सवर्णाें का ही समर्थक माना गया था जबकि 1989 में भाजपा के द्वारा अपने चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़ों को आरक्षण का मुद्दा शामिल किया था जबकि कुछ आनुषांगिक संगठन आरक्षण का विरोध कर रहे थे। यह समझा गया कि लाल कृष्ण आड़वाणी भी आरक्षण का विरोध करने तथा अपने परम्परा गत वोट बैंक को संगठित करने के लिए रथ यात्रा निकाल रहे है। मंड़ल आयोग की सिफारिशों को लागू कर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने स्वंय को चै. देवी लाल व आड़वाणी से इक्कीस साबित करने के लिए यह राजनीतिक कदम उठाया था।

लाल कृष्ण आड़वाणी अपनी रथ यात्रा में मंदिर  को भारतीय राष्ट्रीयता का चिन्ह बताते हुए आस्था, विश्वास, राष्ट्रीय भावना से प्रेरित एक पवित्र अनुष्ठान की ही संज्ञा दे रहे थे। हिन्दु समुदाय का हृदय राम जन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण चाहता था, उससे कोई राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का उनका उद्देश्य नहीं था। भाजपा राम जन्म भूमि मंदिर को राष्ट्रीयता का मार्ग दर्शक मानकर धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। इसके लिए उस समय पोलेंड़ का उदाहरण भी दिया गया था कि 300 वर्ष पूर्व रुसियों ने पोलेंड़ की राजधानी वारसा में आर्थोड़ोक्स चर्च को ध्वस्त कर उस पर अपना कैथेड्रल चर्च खड़ा कर दिया था परन्तु जब पोलेंड़ 1917 में रुस से मुक्त हो गया तो वहां की जनता ने अपने पुरानी चर्च की बहाली को अपने कर्तव्य से जोड़ते हुए रुसी कैथेड्रल को तोड़ दिया और अपने पुरानी तर्ज पर पूजा स्थल को बहाल कर दिया।

अतः भारत में 495 वर्ष से एक मंदिर को तोड़ कर वहां पर उसी के मलबे से मस्जिद खड़ी कर दी गई थी जिसकी बात का साक्ष्य वहां की खुदाई में निकले मूर्ति व अन्य सामान से हो रही थी। मंदिर तो देश में और भी बहुत थे। एक राम जन्म भूमि पर ही प्रहार क्यों किया गया क्योंकि बाबर का उद्देश्य इस कृत्य से हिन्दुओं को नीचा दिखा कर उनकी आस्था पर चोट करना था। इसी प्रकार मथुरा में कृष्ण जन्म भूमि व काशी में विश्वनाथ मंदिर की बगल में ही मस्जिद खड़ी करने के पीछे कोई धार्मिक भावना नहीं थी परन्तु हिन्दुओं की आस्था व विश्वास पर चोट करना मात्र ही था।

इन सबसे भारतियों की राष्ट्रभाव पर चोट करना ही मात्र एक मात्र उद्देश्य था। अतः राम जन्म भूमि पर मंदिर का निर्माण राजनीति नहीं अपितु वह पूजा पद्धति से परिभाषित धर्म भी नहीं है बल्कि राष्ट्रनीति है। एक राष्ट्रीय चेतना का भाव है जिसकी तुलना मंड़ल आयोग की सिफारिशों को लागू करके राजनीति से कदापि नहीं की जा सकती है।

वर्ष 2019 में देश की अदालत ने भी राम जन्म भूमि के पक्ष में निर्णय दिय तथा 2020 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उसका शिलान्यास किया तथा अपने सम्बोधन में भी उसको सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतीक के रुप में ही कहा गया तथा 495 वर्ष की लड़ाई का पटाक्षेप हो गया। इतनी लम्बी लड़ाई इसलिए ही लड़ी गई क्योंकि एक समुदाय विशेष एक सच्चाई को समझना अपनी तौहीन समझ रहा था जिस प्रकार गाय को हिन्दू समुदाय पूजा के लायक मानता है तथा दूसरा समुदाय विशेष उसकी हत्या करना अपना गौरव मानता है कि हम हिन्दुओं की आस्था पर चोट कर रहे है।

इसी कारण से भारत 1947 से आज तक दंगा मुक्त नहीं हो पाया है तथा अन्य विकसित देशों की तुलना में पिछड भी गया है। यदि प्रत्येक समुदाय दूसरे समुदाय की भावना का खास ख्याल रख कर ऊंच नीच की भावना को त्यागे तो देश में शांति स्थापित होगी और विकास की गति भी तीव्र हो सकेगी। राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के लिए व्यापक स्तर पर समर्पण भाव भी सामान्य जनता में देखा जा रहा था।

मंड़ल की राजनीति के परिणाम स्वरुप ही जातिवादी राजनीति करने वाले कई राजनीतिक दलों का अभ्युदय हुआ और उन दलों ने पिछड़े वर्ग के मतों के आधार पर सत्ता भी हासिल की जिसमें प्रमुख राजनेता कांशीराम, मुलायम सिंह यादव, कु. मायावती आदि रहे जो पिछड़े, दलित, मुस्लिमों को लेकर नवीन समीकरण बनाते व बिगाड़ते रहे है। प्रतिउत्तर में भारतीय जनता पार्टी ने भी हिन्दुत्व का कार्ड़ खेल कर अपने परम्परागत वोट तथा गैर जाट व गैर पिछड़ों को अपनी ओर खींचा जिसके परिणामस्वरुप 2014 तथा 2019 में लेाकसभा में अच्छी सफलता प्राप्त कर 2017 में उ.प्र. विधानसभा तें भी सफलता प्राप्त कर ली। 1993 में दलित, पिछडों व मुस्लिमों के सहारे मुलायम सिंह यादव व कांशी राम ने उत्तरप्रदेश में सत्ता हासिल की जो कि 1990 के मंड़ल आयोग को लागू करने की राजनीति का ही परिणाम थी परन्तु 1993 से चला यह प्रयोग 1995 में टूट गया फिर 2007 में कु. मायावती ने दलित, मुस्लिम व सवर्णो का समीकरण बनाई तथा सत्ता हासिल की फिर 2012 में सपा के अखिलेश यादव ने पिछड़े, मुस्लिमों व सवर्णों के आधार पर सरकार बनाने मे सफलता प्राप्त की। इससे यही प्रतीत होता है कि 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों की राजनीति ने जाति आधारित सत्ता हथियाने का एक मात्र मंत्र राजनेताओं को दे दिया और अब यदि कोई दल इस आरक्षण नीति की समीक्षा करने की बात भी करता तो वह दल आरक्षण विरोधी करार दे दिया जाता है और सत्ता से बाहर होने का खतरा उस पर मंडराने लगता है।

अब राम जन्म भूमि पर मंदिर बन जाने का कार्य का शुभारम्भ होने से इस पर की जा रही यदि कोई राजनीति है तो वह समाप्त हो जायेगी। यदि यह राष्ट्रनीति साबित होती तो देश व प्रदेश का विकास हो सकेगा। यदि इस राष्ट्रनीति से सामाजिक न्याय स्थापित करने में कोई सफलता मिलती है तथा जातिय विद्वेष कम होता है तो राष्ट्र के लिए बहुत ही शुभ माना जायेगा जिसकी सम्भावना अधिक व्यक्त की जा रही है।


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल
44 आदर्श काॅलोनी
मुजफ्फरनगर 251001 (उoप्रo)


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल सनातन धर्म महाविद्यालय, मुजफ्फरनगर (उoप्रo), के वाणिज्य संकाय के संकायाध्यक्ष व ऐसोसियेट प्रोफेसर के पद से व महाविद्यालय के प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त हैं तथा स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार हैं।

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