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अयोध्या में श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा भक्ति, आस्था, श्रद्धा या विश्वास? - By Pavan Kumar Rajput

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अयोध्या में श्री राम मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को वैश्विक स्तर पर सभी देशवासियों के लिए एक बड़ा दिन है क्योंकि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम भगवान श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या में होने वाला है। प्राण प्रतिष्ठा -हिंदू धर्म परंपरा में प्राण प्रतिष्ठा एक पवित्र अनुष्ठान है जो किसी मूर्ति या प्रतिमा में उस देवी, देवता का आवाहन कर उसे पवित्र दिव्य बनाने के लिए किया जाता है प्राण शब्द का अर्थ जीवन है, जबकि प्रतिष्ठा का अर्थ स्थापना है। अर्थात कोई मूर्ति तब तक सिर्फ पत्थर की मूर्ति ,प्रतिमा ही है ,वह पूजनीय नहीं है जब तक उसमें अनुष्ठान अनुसार प्राण प्रतिष्ठित न किए जाएं।  आज समस्त राम भक्तों के लिए हर्षोल्लास का दिन है।यह राम भक्तों की आस्था ही थी कि आज अयोध्या में राम मंदिर राम लला प्राण प्रतिष्ठा का दिन आ ही गया, क्योंकि आस्था अक्षर उम्मीद से जुड़ी होती है उम्मीद कुछ पाने की, उम्मीद कुछ करने की, उम्मीद कुछ पूरा होने की, आस्था कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि आस्था एक पूर्ण विश्वास है, जो उस सम्मान को दर्शाता है जो रखी गई तारीख 22 जनवरी को अयोध्या में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा के...

सरल, सादगीपूर्ण, सकारात्मक व्यक्तित्व के धनी थे पूर्व प्रधान मंत्री गुलजारी लाल नंदा - By पवन कुमार 'माहियान'

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तीन बार कार्यवाहक प्रधान मंत्री पद पर रहे गुलजारी लाल नंदा को मकान मालिक ने  इस लिए मकान से निकल दिया क्योंकि वो मकान का किराया नहीं दे पा रहे थे। आज स्वार्थी राजनीति एवं राजनीतिक लोगों को देखकर विश्वास नहीं होता कि राजनीति में  गुलजारी लाल नंदा जैसे भी लोग कभी थे। गुलजारी लाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 में पंजाब के सियाल कोट में हुआ था। उन्होंने लाहौर, आगरा एवं इलाहाबाद से अपनी शिक्षा पूरी की थी। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1920 - 1921) श्रम संबंधी समस्याओं पर एक शोध अध्येता के रूप में कार्यरत रहे, नेशनल कॉलेज मुंबई में अर्थशास्त्र के अध्यापक बने। और इसी वर्ष वे असहयोग आंदोलन में शामिल हुए, 1922 में  वे अहमदाबाद टेक्सटाइल लेवर एसोसिएशन के सचिव बने, उन्हे 1932 में सत्याग्रह के लिए जेल जाना पड़ा। वह देश के बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर रहे। गुलजारीलाल नंदा भारत के पहले एवं मात्र कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे वे एक भारतीय राजनीतिक, शिक्षाविद एवं अर्थशास्त्री साहित्यकार थे। एक कार्यवाहक प्रधानमंत्री एक कैबिनेट मंत्री एवं सदस्य होता है अक्सर (वेस्ट मिनिस्टर प्रणाली वाले देशों में) जो ...

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से महिलाओं का उत्थान - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)

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भारत के संविधान का अनुच्छेद 44 जो 23 नवम्बर 1948 को लम्बी बहस के उपरान्त जोड़ा गया था इसमें कहा गया गया है कि भारत के सभी नागरिकों के लिए धर्म, क्षेत्र, लिंग, भाषा, आदि से ऊपर उठ कर समान नागरिक कानून लागू किया जाये, जिसका निर्देश संविाधान ने सरकार को दिया था। यदि भारत देश में समान नागरिक संहिता स्थापित हो जाती है तो उससे सबसे ज्यादा लाभ देश की 50 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाओं को मिलेगा जो स्वतंत्रता के 73 वर्ष व्यतीत जाने पर भी परतंत्रता व मजहबी आधीनता में अपना जीवन व्यतीत कर रही है। कुछ मजहबी कट्टरपंथी लोग समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को एक मजहब विशेष के विरुद्ध ही रेखांकित कर देते है। भारत का उच्चतम न्यायालय लम्बे समय से देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लाने की बात करता रहा है। भारत का संविधान देश के प्रत्येक धर्म व जाति के लोगों के समान अधिकार और कर्तव्य की बात करता है। क्या वे यह बता सकते है कि कितने मुस्लिम देशों या अन्य देशों में वहां प्रत्येक धर्म व मजहब के नागरिकों के लिए अलग अलग कानून है? कानून का कोई धर्म व मजहब नहीं होता है। फिर भारत जैसे देश में अलग अलग ध...

मंड़ल व कमंड़ल में राजनीति व राष्ट्रनीति का अंतर निहीत है - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)

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वर्ष 1990 में मंड़ल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने समाज के पिछड़े वर्ग के लोगों को 27 प्रतिशत का आरक्षण देने के लिए एक राजनीतिक कदम उठाया क्योंकि तभी भाजपा के प्रमुख राजनेता लाल कृष्ण आड़वाणी ने आयोध्या में रामजन्म भूमि मंदिर के निर्माण के लिए गत कई दशकों से एक बहुत सोची समझी गई राष्ट्रनीति के तहत सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा का एक संकल्प लिया था। आड़वाणी की रथ यात्रा देश में राष्ट्र भावना को जागृत करते हुए सम्पूर्ण राष्ट्र को एक सुत्र में पिरोने के लिए उठाया गया कदम था तथा यह एक राष्ट्रीय कार्य था क्योंकि यह महसूस किया जा रहा था कि जनमानस बाबरी ढ़ांचे को लेकर एक प्रकार की गुलाम व हीन भावना से गृस्त है। उसका तत्कालीन राजनीतिक महत्व नहीं था, न ही उससे भाजपा को रामजन्म भूमि मंदिर मन जाने से कोई राजनीतिक लाभ होता परन्तु भाजपा के इस अभियान को जिस प्रकार विपक्ष ने मुद्दा बनाया जिससे उनकी राजनीतिक कुर्सी हिलती सी लगी तो उन्होंने कुर्सी बचाने व अपने अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने के लिए केन्द्र सरकार के संकेत पर 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में...