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कुंभ मेले का पुण्य | अद्भुत कहानी

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एक संत को एक अद्भुत सपना आया। सपने में सभी तीर्थों की महफिल सजी हुई थी। चर्चा गरम थी—इस कुंभ मेले में सबसे अधिक पुण्य किसने कमाया ? श्री प्रयागराज ने बड़ी विनम्रता से कहा , " इस बार सबसे अधिक पुण्य रामू मोची ने अर्जित किया है।" गंगा मैया को यह सुनकर हैरानी हुई। उन्होंने तपाक से पूछा , " रामू मोची ? लेकिन वह तो कभी गंगा स्नान के लिए यहां आया ही नहीं।" देवप्रयाग ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा , " हाँ , यहाँ भी नहीं आया था।" रुद्रप्रयाग ने भी हामी भरी , " बिलकुल , हमारे यहाँ भी उसका कोई नामो-निशान नहीं।" फिर भी श्री प्रयागराज अपनी बात पर डटे रहे। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा , " सच यही है कि इस कुंभ के स्नान का सबसे अधिक पुण्य रामू मोची को ही मिला है।" यह सुनकर सभी तीर्थ चकित हो गए। उन्होंने उत्सुकता से पूछा , " आखिर रामू मोची कौन है ? वह कहाँ रहता है , और क्या करता है ?" श्री प्रयागराज ने मुस्कुराते हुए बताया , " वह रामू मोची केरल प्रदेश के दीवा गाँव में रहता है और जूते सिलाई का काम करता है।" सपना यहीं समाप्त हुआ , और स...

खुद से खुद को करें अभिप्रेरित (Motivate) - By Pavan Kumar Rajput

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मैं, "मैं" जो बनकर मैं चला, मैं, "मैं" ही बनकर रह गया, मैं, "मैं" को जब तक मैं ने समझा, मैं अकेला रह गया। आज मैं शब्द जैसे लगता है हम अभिमान, अहंकार, के चपेट में आ गए हों लेकिन ऐसा नहीं है, मैं का हमारी जीवन शैली में बहुत बड़ा महत्व है।  "मैं" (मोटिवेशन) अभी प्रेरक है। भगवत गीता में मैं को आत्मा के रूप में दर्शाया गया है, और भगवत गीता के अनुसार आत्मा ही सत्य है और यह शाश्वत है। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से बताया है कि मैं सभी के हृदय में आत्मा के रूप में स्थित हूँ। मैं कौन हूँ? आप 'मैं कौन हूँ' जानने के लिए अपनी एक पहचान बनाने की कोशिश करते हैं। इसके परिणाम स्वरुप आप खुद स्वयं को जानना चाहते हैं। जब तक आप अपने सच्चे स्वरूप का अनुभव नहीं करते, तब तक आप खुद को उस नाम से जानते हैं जो आपको औरों ने दिया है। 'मैं' को समझने के लिए, जानने के लिए खुद की अंतरात्मा की आवाज को सुनना होगा, खुद की शक्तियों को जानना होगा, मैं को अस्तित्व में लाना होगा। मैं कर सकता हूँ, मैं को करना है, मैं को ही करना है। "मैं" और "हम...

रावण की मृत्यु के बाद माता सीता और शूर्पणखा का मिलन - क्या थी इसकी कहानी?

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रावण के अंत के बाद रामायण के कई संस्करणों और लोककथाओं में एक दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख मिलता है—माता सीता और शूर्पणखा का मिलन। भले ही वाल्मीकि रामायण में इस घटना का स्पष्ट उल्लेख न हो, लेकिन लोक मान्यताओं और कुछ ग्रंथों में इसे विस्तार से बताया गया है। यह प्रसंग करुणा, पश्चाताप और सत्य के महत्व को समझने का एक गहरा उदाहरण है। 1. शूर्पणखा का क्रोध और दुख: बदले की आग रावण की मृत्यु और लंका के विनाश ने शूर्पणखा को गहरे दुःख में डुबो दिया। अपने प्रिय भाई की मौत के लिए वह माता सीता को जिम्मेदार मानती थी। शूर्पणखा का मानना था कि यदि सीता न होतीं, तो रावण का अहंकार भी न उभरता और न ही वह अपने विनाश का कारण बनता। अपने क्रोध और दुख से भरी शूर्पणखा सीता से बदला लेने के उद्देश्य से उनसे मिलने पहुंची। 2. सीता और शूर्पणखा का सामना: क्रोध बनाम करुणा माता सीता से मिलने पर शूर्पणखा ने उन्हें तीखे शब्दों में ललकारा। उसने पूछा, “क्या तुम जानती हो कि तुम्हारे कारण मेरे भाई का अंत हो गया?” लेकिन माता सीता ने शांति और करुणा से जवाब दिया। उन्होंने कहा, “रावण ने अधर्म और अहंकार के मार्ग पर चलकर अपने विनाश को स्...

हमारी प्राथमिकता - भक्ति प्रेम या सांसारिक प्रेम?

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श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे। उन्हें प्रतिदिन रामायण सुनने की बहुत रूचि थी। जहाँ भी कथा चलती, वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते। कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते। एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई नहीं मिला। वहीं पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे। पंडित जी ने संत को प्रणाम किया और पूछा कि महाराज! "क्या सेवा करें?" संत ने कहा, "पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परन्तु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया-पैसा नहीं है। हम तो फक्कड़ साधु हैं। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।" पंडित जी ने कहा, "ठीक है महाराज।" संत और पंडित जी सरयू के किनारे कुंजों में जा बैठे। पंडित जी और संत प्रतिदिन सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा, "पंडित जी! आपने बहुत अच्छी कथा सुनाई। हम बहुत प्रसन्न हैं। हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नह...

कर्मों का फल

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एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके। शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार-बार विनती की। आखिकार शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा। एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया- हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में ...

प्रसंग - मन चंगा तो कठौती में गंगा

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एक बार की बात है, एक परिवार में पति पत्नी एवं बहू बेटा याने चार प्राणी रहते थे। समय आराम से बीत रहा था। चंद वर्षो बाद सास ने गंगा स्नान करने का मन बनाया, वो भी अकेले अपने पति के साथ। बहू बेटा को भी साथ ले जाने का मन नहीं बनाया। उधर बहू मन में सोच विचार करती है कि भगवान मेंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो मैं गंगा स्नान करने से वंचित रह रही हूँ। सास ससुर गंगा स्नान हेतु काशी के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगे तो बहू ने सास से कहा कि माँसा आप अच्छी तरह गंगा स्नान एवं यात्रा करिएगा। इधर आप घर की चिंता मत करिएगा। मेरा तो अभी अशुभ कर्म का उदय है वरना में भी आपके साथ चलती। सारी तैयारी करके दोनों काशी के लिए रवाना हुए। इधर मन ही मन बहू अपने कर्मों को कोस रही थी कि आज मेरा भी पुण्य कर्म होता तो में भी गंगा स्नान को जाती। खैर मन को ढाढस बंधाकर घर में ही रही।  उधर सास जब गंगाजी में स्नान कर रही थी। स्नान करते करते घर में रखी अलमारी की तरफ ध्यान गया और मन ही मन सोचने लगी कि अरे! अलमारी खुली छोड़कर आ गई, कैसी बेवकूफ औरत हूँ! बंद करके नहीं आई। पीछे से बहू सारा गहना निकाल लेगी। यही विचार करते करते...

एक साधारण व्यक्ति को विशेष बनाता है "अध्ययन" - By Pavan Rajput Mahiyan

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लिखित प्रतिलिपि को विचार पूर्वक हृदय से ग्रहण करने का नाम अध्ययन है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पढ़ने का उद्देश्य स्थित कर लेना चाहिए, इसके लिए  मुख्य बात यह है कि पढ़ना नियम पूर्वक हो अर्थात इसके लिए प्रतिदिन (हर रोज) नित्य का समय उपयुक्त है।  पवन कुमार की कलम से - अध्ययन वह क्रिया है जिसे अपने जीवन में प्रतिदिन नित्य अमल में लाने से एक आम व्यक्ति भी खास बन जाता। अध्ययन से लगाव रखने वाला व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण होता है वह सबको सदैव प्रसन्न चित्र अनुभव कराता है, अध्ययन के प्रति मनुष्य की अभिरुचि सदैव उसे उत्थान (तरक्की) की ओर ले जाती हैं, अध्ययन की महिमा अनंत है,इसका कोई अंत नहीं है। किसी भी देश के नागरिक चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हों, जितना ही ज्यादा महत्व अध्ययन को देंगे वह देश उतना  ही प्रगतिशील होगा। व्यक्ति का व्यक्तिगत उत्थान भी संभवत होगा, अध्ययन क्रिया आम तौर पर राजनीति, विज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र, गृह विज्ञान, भूगोल, भाषा विज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन जैसे विषयों पर आधारित होते। अध्ययन के कई लाभ है जैसे छात्र, छात्राएं अनुभव प्राप्त करते है...