नारी एक रूप अनेक - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं
मैं नारी हूँ कहते हैं जिसे लोग अबला
दुर्बला आश्रिता भयभीता
भयभीत इस समाज से
भयभीत पुरूष के अत्याचार से
भयभीत लोकलाज से भयभीत लोकापवाद से
मैं नारी हूँ कहते हैं मुझे शालीनता की प्रतिमूर्ति
सहनशीला शान्तिप्रिया कर्तव्यपरायणा
निभाती हूँ अपना कर्तव्य अपने देश और समाज के प्रति
निभाती हूँ अपना कर्तव्य अपने वंश और परिवार के प्रति
मैं नारी हूँ कहते हैं मुझे लोग त्यागमयी
त्यागमयी तपस्विनी अभिलाषाविहीना
नष्ट कर देती हूँ अपनी आकांक्षाओं को उत्पन्न होने से पहले ही
कभी परिवार की सुख शान्ति के लिए
कभी उनके समृद्ध भविष्य के लिए
मैं नारी हूँ कहते हैं जिसे लोग प्रेरणा स्रोत
ज्ञानवती बुद्धिमती प्रेरणा का स्रोत
निर्भर करती है पुरूष की सफ़लता मेरी ही प्रेरणा पर
मैं उसके मन में ज्ञान का अलक जगाती हूँ
बनकर स्वयं उसकी प्रेरणा उसको सफल बनाती हूँ
मैं नारी हूँ कहते हैं जिसे लोग ज्वालपुंज
दुर्गा काली चंडिका का विकराल रूप
असह्य हो जाता है जब अत्याचार
जग में बढ़ जाता है दुराचार
तब मै बन जाती हूँ शक्ति स्वरूपा
करती हूँ विनाश में पाशविक वृत्तियों का
देखकर मेरा तांडव शूरवीर कंपित हो जाते हैं
मेरे आगे मानव तो मानव देवगण भी शीश झुकाते हैं
मैं नारी हूँ कहते हैं जिसे अनन्त रूपा।

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