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भगवान विष्णु के दसवें 'कल्कि' अवतार: अधर्म (कलयुग) का अंत और सत्ययुग की शुरुआत

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हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में जाना जाता है। उनके अब तक नौ अवतार हो चुके हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका दसवां और अंतिम अवतार, 'कल्कि', अभी होना बाकी है? "श्रीमद्भागवतम, विष्णु पुराण, महाभारत, मत्स्य पुराण और कल्कि पुराण जैसे ग्रंथों में कल्कि अवतार का उल्लेख मिलता है। ऐसा कहा गया है कि कल्कि अवतार, अधर्म और अंधकार के प्रतीक 'काली' का अंत करेंगे और सत्ययुग की शुरुआत करेंगे। विष्णु पुराण के अनुसार, कल्कि का जन्म शम्भाला नामक गाँव में होगा। हिंदू और बौद्ध ग्रंथों में शम्भाला नाम का बहुत महत्व है। शम्भाला मूल रूप से एक संस्कृत शब्द है जो शम्भु से निकला है, जिसका अर्थ है खुशी। यह स्थान बहुत ही खास है, जिसे 'शांति का स्थान' भी कहा जाता है। यह स्थान आध्यात्मिक शांति और सुख का प्रतीक है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ केवल शुद्ध हृदय वाले लोग ही पहुँच सकते हैं। शम्भाला को देवताओं का स्थान माना गया है, जहाँ केवल ईश्वर की इच्छा चलती है। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ न रोग है, न भौतिकवाद। शम्भाला के बारे में एक और रोचक बात यह है कि इसे पवित्र आ...

रावण की मृत्यु के बाद माता सीता और शूर्पणखा का मिलन - क्या थी इसकी कहानी?

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रावण के अंत के बाद रामायण के कई संस्करणों और लोककथाओं में एक दिलचस्प प्रसंग का उल्लेख मिलता है—माता सीता और शूर्पणखा का मिलन। भले ही वाल्मीकि रामायण में इस घटना का स्पष्ट उल्लेख न हो, लेकिन लोक मान्यताओं और कुछ ग्रंथों में इसे विस्तार से बताया गया है। यह प्रसंग करुणा, पश्चाताप और सत्य के महत्व को समझने का एक गहरा उदाहरण है। 1. शूर्पणखा का क्रोध और दुख: बदले की आग रावण की मृत्यु और लंका के विनाश ने शूर्पणखा को गहरे दुःख में डुबो दिया। अपने प्रिय भाई की मौत के लिए वह माता सीता को जिम्मेदार मानती थी। शूर्पणखा का मानना था कि यदि सीता न होतीं, तो रावण का अहंकार भी न उभरता और न ही वह अपने विनाश का कारण बनता। अपने क्रोध और दुख से भरी शूर्पणखा सीता से बदला लेने के उद्देश्य से उनसे मिलने पहुंची। 2. सीता और शूर्पणखा का सामना: क्रोध बनाम करुणा माता सीता से मिलने पर शूर्पणखा ने उन्हें तीखे शब्दों में ललकारा। उसने पूछा, “क्या तुम जानती हो कि तुम्हारे कारण मेरे भाई का अंत हो गया?” लेकिन माता सीता ने शांति और करुणा से जवाब दिया। उन्होंने कहा, “रावण ने अधर्म और अहंकार के मार्ग पर चलकर अपने विनाश को स्...

हमारी प्राथमिकता - भक्ति प्रेम या सांसारिक प्रेम?

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श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे। उन्हें प्रतिदिन रामायण सुनने की बहुत रूचि थी। जहाँ भी कथा चलती, वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते। कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते। एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई नहीं मिला। वहीं पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे। पंडित जी ने संत को प्रणाम किया और पूछा कि महाराज! "क्या सेवा करें?" संत ने कहा, "पंडित जी, रामायण की कथा सुना दो परन्तु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया-पैसा नहीं है। हम तो फक्कड़ साधु हैं। माला, लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा।" पंडित जी ने कहा, "ठीक है महाराज।" संत और पंडित जी सरयू के किनारे कुंजों में जा बैठे। पंडित जी और संत प्रतिदिन सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती। संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते। जब कथा समाप्त हुई तब संत में पंडित जी से कहा, "पंडित जी! आपने बहुत अच्छी कथा सुनाई। हम बहुत प्रसन्न हैं। हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नह...

बिजनौर, धामपुर के फायकू - By Dr. Anil Sharma 'Anil', Dhampur, Bijnor (U.P.)

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अध्यात्म राजनीति में सिरमौर अग्रणी सदैव बिजनौर तुम्हारे लिए। बिजनौर में अग्रणी नगर मेरा धामपुर नगर तुम्हारे लिए। राजा धामदेव ने बसाया  नगर धामपुर कहलाया। तुम्हारे लिए। कहते सब सांस्कृतिक राजधानी इसकी कहूं कहानी तुम्हारे लिए। धर्म, संस्कृति, कला, साहित्य, आयोजन होते नित्य तुम्हारे लिए। अध्यात्मिक केंद्र पानपदासी गुरुद्वारा मंदिर राधाकृष्ण,ठाकुरद्वारा तुम्हारे लिए। रामेश्वर से शिवलिंग साथ लाये बाबा कालिया नाथ तुम्हारे लिए। चारों ओर स्थापित मठ हरते हर संकट तुम्हारे लिए। रामलीला बाग, दशहरा मेला होली हवन अलबेला तुम्हारे लिए। चौराहों पर महान प्रतिमाएं गौरव, सम्मान बढ़ाएं तुम्हारे लिए। महात्मा गांधी धामपुर आये स्वतंत्रता अलख जगाये तुम्हारे लिए। रानी फूलकुमारी का योगदान शिक्षा में पहचान तुम्हारे लिए। राजा रणजीत सिंह मेमोरियल महाविद्यालय भविष्य उज्ज्वल तुम्हारे लिए। धामपुर शुगर मिल स्थापना नगर औद्योगिक बना तुम्हारे लिए। गुड़ शक्कर का कारोबार बड़ी मंडी बाजार तुम्हारे लिए। पंडित रुद्रदत्त शर्मा, विद्वान यही जन्मे श्रीमान तुम्हारे लिए। परशुरामायण के रचयिता सफल, पंडित गौरीशंकर सुकोमल तुम्हारे ल...

कर्मों का फल

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एक बार शंकर जी पार्वती जी भ्रमण पर निकले। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक तालाब में कई बच्चे तैर रहे थे, लेकिन एक बच्चा उदास मुद्रा में बैठा था। पार्वती जी ने शंकर जी से पूछा, यह बच्चा उदास क्यों है? शंकर जी ने कहा, बच्चे को ध्यान से देखो। पार्वती जी ने देखा, बच्चे के दोनों हाथ नही थे, जिस कारण वो तैर नही पा रहा था। पार्वती जी ने शंकर जी से कहा कि आप शक्ति से इस बच्चे को हाथ दे दो ताकि वो भी तैर सके। शंकर जी ने कहा, हम किसी के कर्म में हस्तक्षेप नही कर सकते हैं क्योंकि हर आत्मा अपने कर्मो के फल द्वारा ही अपना काम अदा करती है। पार्वती जी ने बार-बार विनती की। आखिकार शंकर जी ने उसे हाथ दे दिए। वह बच्चा भी पानी में तैरने लगा। एक सप्ताह बाद शंकर जी पार्वती जी फिर वहाँ से गुज़रे। इस बार मामला उल्टा था, सिर्फ वही बच्चा तैर रहा था और बाकी सब बच्चे बाहर थे। पार्वती जी ने पूछा यह क्या है ? शंकर जी ने कहा, ध्यान से देखो। देखा तो वह बच्चा दूसरे बच्चों को पानी में डुबो रहा था इसलिए सब बच्चे भाग रहे थे। शंकर जी ने जवाब दिया- हर व्यक्ति अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है। भगवान किसी के कर्मो के फेर में ...

प्रसंग - मन चंगा तो कठौती में गंगा

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एक बार की बात है, एक परिवार में पति पत्नी एवं बहू बेटा याने चार प्राणी रहते थे। समय आराम से बीत रहा था। चंद वर्षो बाद सास ने गंगा स्नान करने का मन बनाया, वो भी अकेले अपने पति के साथ। बहू बेटा को भी साथ ले जाने का मन नहीं बनाया। उधर बहू मन में सोच विचार करती है कि भगवान मेंने ऐसा कौन सा पाप किया है जो मैं गंगा स्नान करने से वंचित रह रही हूँ। सास ससुर गंगा स्नान हेतु काशी के लिए रवाना होने की तैयारी करने लगे तो बहू ने सास से कहा कि माँसा आप अच्छी तरह गंगा स्नान एवं यात्रा करिएगा। इधर आप घर की चिंता मत करिएगा। मेरा तो अभी अशुभ कर्म का उदय है वरना में भी आपके साथ चलती। सारी तैयारी करके दोनों काशी के लिए रवाना हुए। इधर मन ही मन बहू अपने कर्मों को कोस रही थी कि आज मेरा भी पुण्य कर्म होता तो में भी गंगा स्नान को जाती। खैर मन को ढाढस बंधाकर घर में ही रही।  उधर सास जब गंगाजी में स्नान कर रही थी। स्नान करते करते घर में रखी अलमारी की तरफ ध्यान गया और मन ही मन सोचने लगी कि अरे! अलमारी खुली छोड़कर आ गई, कैसी बेवकूफ औरत हूँ! बंद करके नहीं आई। पीछे से बहू सारा गहना निकाल लेगी। यही विचार करते करते...

प्रसंग - ऐसे हैं हमारे बिहारी जी, ये किसी का कर्ज किसी के ऊपर नहीं रहने देते

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एक बार की बात है, वृन्दावन में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण। वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया। अब था तो सेठ लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक नहीं चल रहा था। उसको व्यापार में बहुत नुकसान हो रहा था। अब वो सेठ उन संत के पास गया और उनको अपनी सारी व्यथा बताई और कहा महाराज आप कोई उपाय करिय। उन संत ने कहा, देखो अगर मैं कोई उपाय जानता तो तुम्हें अवश्य बता देता, मैं तो ऐसी कोई विद्या जानता नहीं जिससे मैं तेरे व्यापार को ठीक कर सकूं। ये मेरे बस में नहीं है, हमारे तो एक ही आश्रय हैं, बिहारी जी। इतनी बात हो ही पाई थी कि बिहारी जी के मंदिर खुलने का समय हो गया। अब उस संत ने कहा, तू चल मेरे साथ, ऐसा कहकर वो संत उसे बिहारी जी के मंदिर में ले आये और अपने हाथ को बिहारी जी की ओर करते हुए उस सेठ को बोले, तुझे जो कुछ माँगना है, जो कुछ कहना है, इनसे कह दे, ये सबकी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। अब वो सेठ बिहारी जी से प्रार्थना करने लगा। दो चार दिन वृन्दावन में रुका फिर चला गया। कुछ समय बाद उसका सारा व्यापार धीरे-धीरे ठीक हो गया, फिर वो समय-समय पर वृन्दावन आने लगा बिहारी...

एक साधारण व्यक्ति को विशेष बनाता है "अध्ययन" - By Pavan Rajput Mahiyan

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लिखित प्रतिलिपि को विचार पूर्वक हृदय से ग्रहण करने का नाम अध्ययन है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पढ़ने का उद्देश्य स्थित कर लेना चाहिए, इसके लिए  मुख्य बात यह है कि पढ़ना नियम पूर्वक हो अर्थात इसके लिए प्रतिदिन (हर रोज) नित्य का समय उपयुक्त है।  पवन कुमार की कलम से - अध्ययन वह क्रिया है जिसे अपने जीवन में प्रतिदिन नित्य अमल में लाने से एक आम व्यक्ति भी खास बन जाता। अध्ययन से लगाव रखने वाला व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण होता है वह सबको सदैव प्रसन्न चित्र अनुभव कराता है, अध्ययन के प्रति मनुष्य की अभिरुचि सदैव उसे उत्थान (तरक्की) की ओर ले जाती हैं, अध्ययन की महिमा अनंत है,इसका कोई अंत नहीं है। किसी भी देश के नागरिक चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हों, जितना ही ज्यादा महत्व अध्ययन को देंगे वह देश उतना  ही प्रगतिशील होगा। व्यक्ति का व्यक्तिगत उत्थान भी संभवत होगा, अध्ययन क्रिया आम तौर पर राजनीति, विज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र, गृह विज्ञान, भूगोल, भाषा विज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन जैसे विषयों पर आधारित होते। अध्ययन के कई लाभ है जैसे छात्र, छात्राएं अनुभव प्राप्त करते है...

संविधान निर्माण हेतु हुआ था 22 समितियों का गठन - By Pavan Kumar Rajput

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22 जनवरी 1947 को उद्देश्य प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद संविधान सभा ने संविधान निर्माण के कार्य को त्वरित गति से पूरा करने के लिए 22 समितियां का गठन किया था। भारतीय संविधान लिखने वाली सभा में 299 सदस्य थे जिनके अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 में अपना काम पूरा कर लिया था और 26 जनवरी 1950 को यह संविधान लागू हुआ था, संविधान सभा की ड्राफ्टिंग, मशोदा, प्रारूप सभा का अध्यक्ष होने के नाते बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माता होने का श्रेय दिया जाता है,बाबा साहब को संविधान निर्माता,संविधान जनक, संविधान का राजा कहा जाता है। ड्राफ्टिंग सभा में 7 व्यक्ति थे। (1) अध्यक्ष - बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, (2) अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर, (3) डॉ. के. एम. मुंशी, (4) सैयद मोहम्मद सादुल्ला, (5) एन गोपाल स्वामी अयंगर, (6) वी एल मित्तर, (7) डी.पी. खेतान थे। क्या आप जानते हैं ? संविधान के हर पन्ने पर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा का नाम लिखा हुआ है, पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने भारतीय संविधान अपनी कलम से लिखा था, जिसको लिखने में 6 महीने ...

अयोध्या में श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा भक्ति, आस्था, श्रद्धा या विश्वास? - By Pavan Kumar Rajput

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अयोध्या में श्री राम मंदिर का उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को वैश्विक स्तर पर सभी देशवासियों के लिए एक बड़ा दिन है क्योंकि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम भगवान श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या में होने वाला है। प्राण प्रतिष्ठा -हिंदू धर्म परंपरा में प्राण प्रतिष्ठा एक पवित्र अनुष्ठान है जो किसी मूर्ति या प्रतिमा में उस देवी, देवता का आवाहन कर उसे पवित्र दिव्य बनाने के लिए किया जाता है प्राण शब्द का अर्थ जीवन है, जबकि प्रतिष्ठा का अर्थ स्थापना है। अर्थात कोई मूर्ति तब तक सिर्फ पत्थर की मूर्ति ,प्रतिमा ही है ,वह पूजनीय नहीं है जब तक उसमें अनुष्ठान अनुसार प्राण प्रतिष्ठित न किए जाएं।  आज समस्त राम भक्तों के लिए हर्षोल्लास का दिन है।यह राम भक्तों की आस्था ही थी कि आज अयोध्या में राम मंदिर राम लला प्राण प्रतिष्ठा का दिन आ ही गया, क्योंकि आस्था अक्षर उम्मीद से जुड़ी होती है उम्मीद कुछ पाने की, उम्मीद कुछ करने की, उम्मीद कुछ पूरा होने की, आस्था कोई अंधविश्वास नहीं बल्कि आस्था एक पूर्ण विश्वास है, जो उस सम्मान को दर्शाता है जो रखी गई तारीख 22 जनवरी को अयोध्या में रामलाल की प्राण प्रतिष्ठा के...