ग़ज़ल : "बाढ़ में सब बह गया है और सबकुछ ठीक है" - डॉ0 अशोक "गुलशन"

बाढ़ में सब बह गया है और सबकुछ ठीक है,

अब न कोई आसरा है और सबकुछ ठीक है।


हो गयीं बर्बाद फसलें पेड़ गायब हो गये,

द्वार पर पानी भरा है और सबकुछ ठीक है।


गाँव आने पर जो दिखता था मुझे हँसते हुये,

आदमी वह  खो गया है और सबकुछ ठीक है।


खाट  पर  बिस्तर  नहीं है और टूटी खाट है,

आठ-दस घर ही गिरा है और सबकुछ ठीक है।


मुँह घुमाकर बात मुझसे कर रहे सब लोग हैं,

सूर्य पश्चिम से उगा है और सबकुछ ठीक है।


काम पर निरहू गये हैं छः महीने बाद फ़िर,

बाँझ को बच्चा हुआ है और सबकुछ ठीक है।


गाय की  पूँजी  रही  जो  वो  दवाई ले गयी,

रह गया बछड़ा बचा है और सबकुछ ठीक है।


पेट की ख़ातिर चलो परदेश को 'गुलशन' चलें,

बस यही इक रास्ता है और सबकुछ ठीक है।



 डॉ0 अशोक "गुलशन "

उत्तरी क़ानूनगोपुरा, बहराइच (उ0प्र0), पिन-271801

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