नारी - By नीमा शर्मा ‘हँसमुख’ Neema Sharma 'Hansmukh', Najibabad

 वो चिता सी जली

रात भर रात भर

वो सुलगती रही

प्रातः तक प्रातः तक।


जिम्मेदारी की लकड़ी 

लगाये हुए कांधे पर बोझ

सबका उठाये हुए

अपनी आशाओं का 

घृत चढ़ाए हुए

वो तो जलती रही

रात भर रात भर।


संस्कारो की चादर को ओढ़े हुए

पुष्प की भांति वो मुस्कुरती रही

शाम ढलते ही वो मुरझाती रही

वो चिता सी जली रात भर रात भर

वो सुलगती रही प्रातः तक प्रातः तक।


कुंभ आँखो का मेरी छलकने लगा

पीड़ा के छिद्र से वो छलकने लगा

वो छलकती रही रात भर रात भर

वो चिता सी जली................।


उसका तन मन समर्पित समाहित हुआ

परिवार को मेरे परिवार को 

कल्पनाओं के कुंड में प्रवाहित हुआ

वो तो बहती रही राख राख बन

वो सुलगती रही प्रातः तक प्रातः तक

वो चिता सी जली रात भर रात भर।।



नीमा शर्मा 'हँसमुख'
नजीबाबाद,  बिजनौर (उ०प्र०) 

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