ना चाहूँ तिरंगा कफ़न के लिए - By Hiten Pratap Singh 'Tadap'


स्वच्छ भोजन कहाँ? स्वस्थ तन के लिए,
अब नहीं साफ हवा, स्वस्थ मन के लिए।
बाप की सैकड़ों डाँट, थी अमृत कभी,
अब एक डाँट भारी, क्यूँ जीवन के लिए?

बल भुजाओं में हो, कुशल रण के लिए,
आत्म बल दिल में हो, निज प्रण के लिए।
तूने जीवन दिया, तुझको अर्पण है ये,
संग तेरे मैं सदा, हर क्षण के लिए।।

रोशनी क्यूँ जले, एक किरण के लिए,
उपवन क्यों खिले, एक सुमन के लिए।
मैं तो चाहता हूँ, जिंदगी चार दिन,
दो कलम के लिए, दो वतन के लिए।।

हाथ जब भी उठे, तेरे नमन के लिए,
खाद तन का बने, देश चमन के लिए।
मैं मरूँ तो तिरंगा, लहराता रहे,
तिरंगा ना चाहे, ‘हितेन’ कफन के लिए।।

हितेन प्रताप सिंह ‘तड़प’
न्यू मीनाक्षी पुरम, मेरठ
मो० 7906992199

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