धर्म परिवर्तन क्यों? - By Neeraj Rajput

आज संसार में सबसे ज्यादा जो चर्चा में रहता है, वह है धर्म। धर्म के कारण ही आज सबसे ज्यादा खून-खराबा, लड़ाई-झगड़े, दंगे-फसाद आदि देखने में आते हैं। वैसे तो हम गाते हैं कि ‘‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना’’, परंतु मजहब की वजह से ही आज सब कुछ विपरीत देखने में आता है। क्योंकि लोगों ने धर्म को समझा ही नहीं कि धर्म क्या है? लोगों ने धर्म को मन्नत माँगने तथा अपने पूर्वजों, महापुरुषों के जीवन-चरित्रों की अपने मन मुताबिक व्याख्या करना मात्र बना लिया है।

अब हम अपनी वास्तविक चर्चा पर आते हैं कि धर्म परिवर्तन हो क्यों रहा है? महर्षि मनु कहते हैं धर्मः एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद् धर्मो न हन्तव्यो, मा नो धर्मो हतोऽवर्धितः।। अर्थात मरा हुआ या त्यागा हुआ धर्म मनुष्य को मारता है और धर्म की रक्षा करने पर वह हमारी रक्षा करता है। इसलिए पहले धर्म को समझे और किसी भी अवस्था में धर्म नहीं मारना व त्यागना चाहिए।

भारत को एक मत निरपेक्ष राष्ट्र माना जा सकता है, किंतु धर्मनिरपेक्ष नहीं। क्योंकि धर्म तो सभी मानवों का एक ही होता है। जिस प्रकार परमात्मा के बनाए सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी आदि सभी ग्रह-नक्षत्र सभी मनुष्यों, जीवों के लिए एक ही है। उसी प्रकार परमात्मा का बनाया गया मानव का धर्म भी एक ही है। मानव धर्म ही सर्वमान्य धर्म है। धार्यते इति धर्मः, अर्थात धर्म तो धारण किया जाता है। यह आत्मा का गुण है दिखावटी नहीं। सृष्टि के प्रत्येक जड़-चेतन वस्तु अपने धर्म के साथ विद्यमान है। जैसे अग्नि अपने प्रकाश और ऊष्मा रूपी धर्म के साथ ही रहती है, जिससे वन्य हिंसक पशु भी भय खाते हैं और इसका धर्म समाप्त होते ही एक चींटी भी इसको रौंद देती है। जब जड़ पदार्थ भी अपने धर्म का पालन करते हैं तो फिर हे बुद्धि के पुतले मानव! सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ जीव! तू ही क्यों धर्म त्यागने के लिए आतुर रहता है? धर्म रहित मानव पशु तुल्य हो जाता है। मेरे विचार से यह कहना भी पशुओं का अपमान है, क्योंकि पशु कभी भी परमात्मा द्वारा निर्धारित मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। जैसे गाय कभी अपना धर्म त्याग कर माँस नहीं खाती और न ही बिना ऋतु काल के सांड से संसर्ग करती है।

अब प्रश्न यह है कि क्या हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि धर्म हैं? नहीं, यह शब्द तो धर्म के एक-एक अंग हैं। वास्तव में ये धर्म नहीं, मत, पंथ या संप्रदाय हैं। यद्यपि इन विचारों, मतों को ही धर्म माना जाने लगा है। यदि हम इन्हें धर्म मान भी लें तो क्या मात्र लोभ या भय से इनका त्यागना उचित है? क्या ईसाई धर्म अपनाने से सरकारी नौकरी मिल जाएगी? या इस्लाम कबूल करने से अमर हो जाओगे? या गुरु मंत्र आदि अनुसरण करके, बिना कोई काम किए धनवान बन जाओगे?

वैदिक सिद्धांतों में कौन सी कमी नजर आई जो अन्य मतों ने तुम्हें आकर्षित किया? उत्तर सिर्फ लालच या भय है। स्मरण रहे! जिस धर्म को छोड़कर तुम ईसाई, मुस्लिम या अन्य मत वाले बन रहे हो, इसी की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का भाला और शिवाजी की तलवार चमकी थी। गुरु गोविंद सिंह जी का संपूर्ण परिवार धर्म पर न्यौछावर हो गया। हकीकत राय, बंदा बैरागी भी इसी वैदिक धर्म पर बलिदान हो गए। कुमारिल भट्ट को तुषाग्नि में जलना पड़ा और महर्षि दयानंद सरस्वती ने 17 बार विषपान किया। इसी की रक्षा के लिए पंडित लेखराम को चलती ट्रेन से कूदना पड़ा। इसी कारण शुद्धि-यज्ञ से प्रेरणा स्वामी श्रद्धानंद को गोली खानी पड़ी। फिर भी उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा।

परन्तु आज के पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ नौकरी और आलसी जीवन यापन करने के लिए सहर्ष धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। इस प्रकार लोभ से धर्म परिवर्तन करने का अर्थ है, लालची कुत्ते की तरह इधर-उधर दौड़ पड़ना। मैं मानता हूँ कि भूख इंसान को गद्दार भी बना देती है, परन्तु इस स्वर्ग जैसे देश में पैदा होकर, नकारा रहकर धर्म परिवर्तन करना एक अपराध तुल्य है। मात्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए धर्म परिवर्तन करना पशुओं से भी हीन कृत्य है। यह मेरा संदेश सभी भारतवासियों के लिए है। हम सभी, धर्म के लिए कुर्बान होने वालों को पढ़ें और लोभ व भय में धर्म परिवर्तन कर उनका अपमान न करें।


नीरज राजपूत
साहित्यिक सम्पादक - पुरूरवा मासिक पत्रिका
ग्राम भगवानपुर, किरतपुर (बिजनौर)

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