देश की अखंडता के लिए समान नागरिक संहिता (सीसीसी) एक संवैधानिक आवश्यकता - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)

वर्तमान में जो लोग नागरिक संशोधन कानून (सीएए), एनआरसी तथा एनपीआर का समर्थन कर रहे हैं, वे संविधान की दुहाई दे रहे हैं। जबकि इनका विरोध करने वाले संविधान के अनुच्छेद 14 की आड़ लेकर उसका विरोध कर रहे हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि भारत में नागरिकता प्राप्त करना उतना ही दुश्वर तथा कठिन होना चाहिए जितना कि यूरोप इत्यादि के किसी अन्य देश में होता है। भारत के एक-एक नागरिक का रिकाॅर्ड भारत सरकार के पास होना ही चाहिए।

भारत को कभी भी भावनाओं में बहकर अपनी सीमाऐं किसी के लिए भी नहीं खोल देनी चाहिए, क्योंकि ऐसे अनाधिकृत घुसपैठिये लोग भारत में रह कर भारत की जड़ को ही खोखला कर देते हैं। इन सब की ऊहांपोह में हम एक बात भूल जाते हैं कि देश की संविधान सभा ने 23 नवम्बर 1948 को विस्तृत चर्चा के उपरान्त अनुच्छेद 44 को जोड़ा था तथा स्वतंत्र हुए भारत की सरकार को निर्देश दिया था कि देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (सीसीसी) लागू होनी चाहिए।

संविधान की मूल भावना भी यही है कि भारत में रहने वाले किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार का भेदभाव क्षेत्र, भाषा, लिंग, अर्थ, धर्म इत्यादि के आधार पर नहीं होना चाहिए। भारत का कानून सभी भारतीयों के लिए एक समान होना चाहिए। अलग अलग धर्मों, क्षेत्रों, जातियों, लिंग व भाषा इत्यादि के निरपेक्ष एक समान नागरिक संहिता (सीसीसी) को लागू करना चाहिए।

परन्तु संविधान लागू होने के 70 वर्ष के उपरान्त भी राजनीतिक कारणों तथा अन्य राजनीतिक हितार्थ व अपरिहार्यताओं के कारण समान नागरिक संहिता (सीसीसी) के निर्माण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है तथा इसका मसौदा तैयार करने के लिए भी गम्भीर प्रयास नहीं किये गये हैं। मई 2014 से जब से भाजपा के नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी है, वह बिना किसी वोट बैंक के लालच में देश के मुर्घन्य महापुरुषों के 1947-1950 के आसपास व संविधान के निर्माण के दौरान जो सपने देखे गये थे उन्हीें सपनों को पूरा करने के लिए सामान्य न्याय के आधार पर विभिन्न अति महत्वपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं। उसी श्रंखला में अब यह भी आवश्यक हो गया है कि सरकार समान नागरिक संहिता (सीसीसी) को भी संसद के दोनों सदनों से पारित करवा करके सम्पूर्ण देश में लागू करे। स्वंतत्रता से पूर्व भी अंग्रेजों ने भारतीय दंड़ संहिता (आईपीसी) 1860, पुलिस एक्ट 1861, एविडैंस एक्ट 1872, सिविल प्रोसीजर कोड़ (सीपीसी) 1908 सहित सैकड़ों अन्य कानून लागू किये गये थे जो सभी भारतीय लोगों पर समान रुप से लागू होते थे। इसी प्रकार गोवा में सभी पर लागू होने वाला पुर्तगाल सिविल कोड 1867 भी गोवा के सभी नागरिकों पर समान रुप से लागू होता था जो पुर्तगालियों ने बनाया था।

उच्चतम न्यायालय ने 1985 में शाहबानो मामले में टिप्पणी की थी कि यह दुख का विषय है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बन कर रह गया है, जबकि समान नागरिक संहिता (सीसीसी) विरोधाभासी विचारों वाले कानूनों के प्रति पृथक्करणीय भाव को समाप्त कर राष्ट्रीय अखंड़ता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग करेगा। 1995 में सरला मुद्गल मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार और कितना समय लेगी? देश में समान नागरिक संहिता (सीसीसी) को अनिश्चित काल के लिए निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है। धर्म के नाम पर सिविल व भौतिक आजादी का गला घोंटना स्वराज्य नहीं, बल्कि निर्दयता है। इसी निर्दयता से सुरक्षा प्रदान करने और राष्ट्रीय एकता एवं सौहार्द को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत जरुरी है। 2003 में जाॅन बलवन्तम मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह बड़े दुख की बात है कि संविधान का अनुच्छेद 44 को आज तक लागू नहीं किया गया। समान नागरिक संहिता (सीसीसी) देश में वैचारिक मतभेदों को दूर कर देश की एकता और अंखड़ता को मजबूत करने में सहायक होगा। 2017 में भी सायराबानो मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हम भारत सरकार को निर्देशित करते हैं कि वह उचित विधान बनाने पर विचार करे। 2019 में उच्चतम न्यायालय ने फिर कहा कि गत 63 सालों में समान नागरिक संहिता (सीसीसी) को लेकर सरकार की तरफ से कोई प्रयास नहीं किया गया।

डाॅ० अम्बेड़कर ने भी अनुच्छेद 44 पर बहस के दौरान कहा था कि व्यावहारिक रुप में देश में एक समान नागरिक संहिता (सीसीसी) है, जिसके प्रावधान सर्वमान्य हैं और समान रुप में देश में लागू होते हैं। मात्र विवाह व उत्तराधिकार के क्षेत्र में समान कानून लागू नहीं है। यह बुहत छोटा सा क्षेत्र है जिस पर हम कानून नहीं बना सके हैं। कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा था कि कुछ लोगों का मानना है कि समान नागरिक संहिता (सीसीसी) बन जायेगा तो धर्म खतरे में पड़ जायेगा और समुदाय मैत्रीयता के साथ नहीं रह सकते हैं। समान नागरिक संहिता (सीसीसी) से मैत्रीयता मजबूत होगी। अतः शादी, विवाह व उत्तराधिकार के मामलों में भी लोगों में एक समान सहमति तक पहुँचने का प्रयास किया जाये। अपराधिक कानून देश के हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, ईसाई इत्यादि सभी समुदायों पर एक समान लागू होता है तो क्या तब मुस्लिम अपवाद बने रह पाए और क्या वे आपराधिक कानून की एक व्यवस्था को लागू करने के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह कर पाये?

अपराध संहिता हिन्दू व मुसलमान पर एक समान लागू होती है व वह कुरान के द्वारा नहीं, बल्कि विधिशास्त्र द्वारा संचालित होते है। के०एम० मुंशी ने भी प्रगतिशाील समाज में धार्मिक क्रिया कलापों में हस्तक्षेप किए बिना हमें देश को एकीकृत करना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि जब क्रिमिनल लाॅ एक है तो सिविल लाॅ क्यों नहीं एक हो सकता? जब संविधान निर्माताओं ने शादी विवाह के लिए एक कानून बनाने की सिफाारिश की है तो क्या संविधान निर्माता साम्प्रदायिक थे? डाॅ० राममनोहर लोहिया ने भी कहा था कि एक ही विषय पर अलग कानून धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतान्त्रिक मूल्यों और देश की एकता व अखंड़ता के लिए खतरनाक है।

धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। अनुच्छेद 44 से देश की एकता तथा अखंडता मजबूत हो सकेगी। जब गोवा में एक कानून सभी लोगों पर लागू हो सकता है तो यह व्यवस्था पूरे देश में क्यों नहीं लागू हो सकती? यह भारत देश संविधान से चलता है तथा यहाँ गीता, रामायण, वेद, कुरान, बाइबिल से शासन व प्रशासन नहीं चलता है। यदि महिला व पुरुष में गैर बराबरी हो तो वह रीति कुरीति होगी और उसे धार्मिक स्वतंत्रता नहीं माना जायेगा। अतः समता, समानता, समान अवसर तथा समान अधिकार संविधान की मूल भावना है। अतः संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रदत्त धार्मिक आजादी की दुहाई देकर समान नागरिक संहिता (सीसीसी) का विरोध नहीं होना चाहिए।

समान नागरिक संहिता (सीसीसी) से देश और समाज में सैंकडों कानूनों से मुक्ति मिलेगी, जिन ब्रिटिश कानूनों से भारतियों के मन में हीन भावना पैदा होती है, उस भावना से मुक्ति मिल सकेगी। एक पति तथा एक पत्नि की अवधारणा सभी भारतियों पर लागू होगी और अपवाद का लाभ सभी भारतियों को मिल सकेगा चाहे वह किसी भी धर्म का हो। न्यायालय के माध्यम से विवाह विच्छेद करने का एक सामान्य नियम सबके लिए लागू होगा, पैत्रक सम्पत्ति में से पुत्र, पुत्री तथा बेटा व बहू को समान अधिकार प्राप्त होगा और सम्पत्ति को लेकर सभी विसंगतियाँ दूर होंगी। विवाहोपरान्त अर्जित सम्पत्ति में विवाह विच्छेद की स्थिति में पति व पत्नी का समान अधिकार होगा, दान, वसीयत, संरक्षकत्व बँटबारा, गोद देने लेने इत्यादि के संबंध में सभी भारतीयों पर एक समान कानून लागू होगा। राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र एवं एकीकृत कानून होगा। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र व लिंग के आधार पर अलग-अलग कानून से अलगाववादी मानसिकता उत्पन्न होती है, वह समाप्त होगी। अलग-अलग कानून समाप्त होने से अनावश्यक मुकदमेबाजी कम हो सकेगी। धार्मिक अधिकार जैसे नमाज, पूजा, सजदा, प्रार्थना, व्रत, रोजा, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा, विवाह, निकाह, अंतिम संस्कार आदि के लिए कोई भी तरीका अपनाने में कोई बाधा नहीं हो सकेगी।

समान नागरिक संहिता (सीसीसी) से मुस्लिम कानून में एक पति को चार पत्नी की छूट समाप्त हो सकेगी। मुस्लिम लड़कियों की शादी 18 वर्ष तथा लड़कों की शादी 21 वर्ष में होगी। मौखिक विवाह विच्छेद, तलाक समाप्त हो सकेंगे तथा सभी को एक सामान्य न्याय प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ेगा। मुस्लिम देशों में भी मौखिक तलाक अमान्य हो गये हैं। मौखिक वसीयत नहीं की जा सकेगी तथा केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य होगा। सम्पत्ति पर पुत्र व पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त हो सकेंगे। कोई भी व्यक्ति किसी को भी गोद ले सकेगा।

इस प्रकार समान नागरिक संहिता (सीसीसी) से राष्ट्र की मुख्यधारा का निर्माण हो सकेगा और अलगाववाद की भावना समाप्त हो सकेगी। अभी लोगों में इसके लिए जागरुकता की आवश्यकता है। इसका मसौदा तैयार कर ऑनलाइन बेबसाइट पर डाल देना चाहिए जिससे समान नागरिक संहिता (सीसीसी) पर एक व्यापक बहस चले तथा सभी भारतीय एक राय होकर सहर्ष समान नागरिक संहिता (सीसीसी) को स्वीकार कर सकें। चूँकि मुसलमानों को शरीयत व कुरान में कुछ भिन्न स्थितियाँ प्राप्त हैं, प्रगतिशाील मुस्लिम देशों में भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगतिशाील विचार स्वीकार कर कानूनों में परिवर्तन किया है। जैसे मुस्लिम बहुल देश में मौखिक तलाक मान्य नहीं है। उसी प्रकार परिवार नियोजित करने के लिए भी उपाय भी किये जा रहे हैं। परन्तु भारत में समान नागरिक संहिता (सीसीसी) के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा भारत के राजनीतिक दल हैं जो मुस्लिम वोट बैंक की खातिर निरन्तर उनको भड़काने का कार्य करते रहते हैं। समान नागरिक संहिता (सीसीसी) से देश की अंखड़ता मतबूत हो सकेगी तथा अलगाववाद की भावना का दमन हो सकेगा। समान नागरिक संहिता (सीसीसी) के लिए बहुत जागरुकता की आवश्यकता महसूस की जा रही है। तभी संविधान निर्माताओं के द्वारा 23 नवम्बर 1948 को दिये हुए विचार व संविंधान के अनुच्छेद 44 का सम्मान हो सकेगा।


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल
44 आदर्श काॅलोनी
मुजफ्फरनगर 251001 (उoप्रo)


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल सनातन धर्म महाविद्यालय, मुजफ्फरनगर (उoप्रo), के वाणिज्य संकाय के संकायाध्यक्ष व ऐसोसियेट प्रोफेसर के पद से व महाविद्यालय के प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त हैं तथा स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार हैं।

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