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भगत सिंह - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

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  खेतों में वो गोली बोना सिखा गया  पहन बसंती चोला मान हमारा बढ़ा गया  हिल गई बर्तानिया हुकुमत की चूंरें  मच गया हड़कम्प ब्रिटेन में पूरे  वो माँ का लाल तो आजादी का दीवाना था  बाकी सारा जग उसके लिए बेगाना था  थी दुल्हन आजा़दी उसकी, जीवन उसी पर वारा था  दुर्गा भाभी का वो देवर सबकी आखों का तारा था  संसद में बम फेंककर बहरों को आवाज़ सुना गया  चूहों जैसे दिल वाले अंग्रेजों को वो हिला गया  झूल गया फ़ाँसी पर फंदा अपना चूमकर  वो मतवाला जीना हमको सिखा गया झूमकर ।   मौलिक रचना: दीप्ति मिश्रा उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)

धूप हो या छाँव हमें निरन्तर चलना होगा - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

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धूप हो या छाँव हमें निरन्तर चलना होगा।    भीड़ हो या गाँव आगे सदा निकलना होगा॥  मिलेंगे कई साँचे तुम्हें तोड़ सभी साँचों को।  एक नया साँचा तुम्हें स्वयं गढ़ना होगा॥  राहें हो चाहे कितनी पथरीली हर मुश्किल से लड़ना होगा।    आए आँधी या तूफ़ा हो हमको कभी न डिगा पाएगा॥  बढ़ते हुए क़दमों के साथ हाथ सभी का थामना होगा।  गिर गयें हैं जो लड़खड़ाकर उन्हें उठाकर चलना होगा॥  ज़िन्दगी कोई ख़्वाब नहीं जंग है पथरीली राहों से।  मंज़िल भी आसान नहीं ताज भरा है काँटों से॥  मशाल गर बदलाव की थाम सको तो चलो।  चीर कर अंधेरों को रोशनी ला सको तो चलो॥ मौलिक रचना: दीप्ति मिश्रा उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)

चेहरे की मुसकान बन जाए पहचान - By Dr. Anil Sharma 'Anil', Dhampur, Bijnor (U.P.)

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    चेहरे की मुसकान, बन जाए पहचान हंसते हंसाते आप, जब खिल खिलाएंगे। हॅंसी एक रामबाण, औषधि का करें काम देख लो प्रयोग कर, कष्ट कट जाएंगे।। शारीरिक मानसिक, कैसी भी हो परेशानी, दूर होगी झटपट, आप सुख पाएंगे। झूम झूम उठे तन, मन भी होगा प्रसन्न,  जोर का ठहाका मित्र, संग में लगाएंगे।। अपनाओ हास्य योग, दूर होंगे सब रोग, होंगे सब ही निरोग, हंसेंगे हंसाएंगे। लाफिंग थेरेपी अब, हो रही है लोकप्रिय देश और विदेश में, लोग अपनाएंगे।। मिट जाते कई शूल, हंसने हंसाने से तो हंसोंगे अगर मित्र, रोग न सताएंगे। हॅंसी एक रामबाण, औषधि का करें काम देख लो प्रयोग कर, कष्ट कट जाएंगे।। डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' धामपुर, उत्तर प्रदेश

वही ठीक लगे घड़ी, जो व्यतीत हो गई - By Dr. Anil Sharma 'Anil', Dhampur, Bijnor (U.P.)

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 पुरातन काल वाली, शिक्षाएं और संस्कृति, संस्कारों सहित अब, रोजगार हो गई।  शिक्षा की दुकानें सजी, शोरूम संस्कारों वाले संस्कृति भी आजकल, तो व्यापार हो गई । योग से निरोग वाले, पैकेज है बिक रहे  सेवा त्याग भावनाएं, आधार ही खो गई । कैसा भी करिए काम, पूरा लीजिएगा दाम  आजकल नीति यही, तो संस्कार हो गई। जीविका कमाने हित, काम सभी जन करें गुरुकुल वाली प्रथा, कालातीत हो गई । अब सब व्यवसाय, संस्कृति संस्कार शिक्षा  सेवा भावना की बात, तो अतीत हो गई । धर्म-कर्म व्यवसाय, कलाएं सभी व्यापार  धन संग गाए जाने, वाले गीत हो गई । अभी बदला समय, और भी यह बदलेगा  वही ठीक लगे घड़ी, जो व्यतीत हो गई। डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' धामपुर, उत्तर प्रदेश

आलस किया, सफलता गयी - By Dr. Anil Sharma 'Anil', Dhampur, Bijnor (U.P.)

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 विधा - छंद शीर्षक - आलस किया, सफलता गयी आलस को ज्ञानी जन, कहते रहे है शत्रु, इससे किसी का कभी, कोई न हुआ भला। काम टलते ही रहे, हाथ मलते ही रहे, वक्त बीत गया जब, जोर न कोई  चला। आलसी प्रवृत्ति वाले, हर एक काम टाले, समय प्रबंधन की, जानते नहीं कला। इसीलिए पछताते, सफलता नहीं पाते, इन्होंने तो हर बार, बस हाथों को मला।। जब भी आलस किया, सफलता गयी दूर, आलस,सफलता की,शत्रुता पुरानी है। सफलता चाहे श्रम, इसमें न पालें भ्रम, आलस को छोड़ यदि, सफलता पानी है। कर्म के बिना न कभी, मिलता किसी को कुछ सतत कर्म ही बस, जीवन निशानी है। आलस है मौत सम, इससे बचेंगे हम, पग पग हो सफल, मन में ये ठानी है।। डॉ. अनिल शर्मा 'अनिल' धामपुर, उत्तर प्रदेश

यारों छोडो स्मोकिंग सभी - By रामवीर सिंह राजपूत

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यारों छोडो स्मोकिंग सभी, जी लो जी भरके ये जिंदगी । ये बीडी सिगरेट, गुटखा तम्बाखू , बेकार की चीजें हैं, इनके बिना ही जीवन में, जीने की असली मोजें हैं, इनको छोड़कर पालो ख़ुशी, जीलो जी भरके ये जिंदगी ।। १ ।। यारों की टोली में, कभी तन्हायी में, मुझको मिली ये लत बुरी, बेपरवाह मन से, मेहनत के धन से, सीने में घोंपी अपने छुरी, बीमारी की दलदल में लाइफ ये फंसी, जीना न सका जी भर के जिंदगी ।। 2।। जब था मैं इनमें जकड़ा, साँसों की बीमारी थी, कभी मुह में छाले थे, दांतों में बीमारी थी, अब सुलझा तो होंठों पे हंसी, जीता हूँ जी भरके ये जिंदगी ।। 3 ।। सांसें भी होंगी ताज़ी तुम्हारी, दूषित न होगा रक्त भी, फिट रहोगे, पैसे बचेंगे, कीमती बचेगा वक्त भी, संभलो बनाओ अच्छी छवि, जीलो जी भरके ये जिंदगी ।। 4 ।। - स्व० रामवीर सिंह राजपूत

जब हाथों से लम्हा फिसल जाता है - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

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जब हाथों से लम्हा फिसल जाता है  जब आँखो में समंदर थम जाता है जब पैरों के नीचे से खींच ले कोई ज़मी  जब न रहे सर पे आसमा की चादर तनी  तब यह पथरीली राहें साथ चलती है हमारे  देती हैं हौसला चलते जाने का  काँटों में फूलों में नदिया की बहती धारों में  क़दमबढ़ाते जाना है पत्थर में फूल खिलाना है  जीवन हर पल गीत है संघर्षो का  हमारे कष्टों के नये अवतरणो का  आशा और निराशा के झूले में - हिचकोले लेते सम्बन्धों का  मंज़िल की तरफ़ बढ़ते क़दमों को  पीछे खींचती जकड़ी ज़ंजीरो का  खड़ी हैं यही राहें रास्ता रोके हर मुश्किल का । मौलिक रचना: दीप्ति मिश्रा उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)