धूप हो या छाँव हमें निरन्तर चलना होगा - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

धूप हो या छाँव हमें निरन्तर चलना होगा। 

  भीड़ हो या गाँव आगे सदा निकलना होगा॥ 

मिलेंगे कई साँचे तुम्हें तोड़ सभी साँचों को। 

एक नया साँचा तुम्हें स्वयं गढ़ना होगा॥ 

राहें हो चाहे कितनी पथरीली हर मुश्किल से लड़ना होगा। 

  आए आँधी या तूफ़ा हो हमको कभी न डिगा पाएगा॥ 

बढ़ते हुए क़दमों के साथ हाथ सभी का थामना होगा। 

गिर गयें हैं जो लड़खड़ाकर उन्हें उठाकर चलना होगा॥ 

ज़िन्दगी कोई ख़्वाब नहीं जंग है पथरीली राहों से। 

मंज़िल भी आसान नहीं ताज भरा है काँटों से॥ 

मशाल गर बदलाव की थाम सको तो चलो। 

चीर कर अंधेरों को रोशनी ला सको तो चलो॥


मौलिक रचना:
दीप्ति मिश्रा

उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)

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