हिन्दी की व्यथा - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

हिन्दी बोली उर्दू से 
न तेरी खता न मेरी ख़ता 
मिली हमें फ़िर किस बात की सजा 
हम दोनो कभी लड़ी नहीं 
शिकायत कभी की नहीं 
फ़िर यह कैसा अलगाव है 
दोनो पक्षों में कैसा टकराव है 
एक दीर्घ मौन के बाद 
बोली उर्दू निराशा से 
कुछ नहीं 
यह षड्यन्त्र है हमारे शत्रु का 
एक प्रयास है आंग्ल चमचो का 
हम दोनों को आपस में लड़ा दिया 
और अंग्रेजी को सम्राट बना दिया 
हम दोनो भोली कन्याएँ भारत की 
नहीं समझ सकी कूटनीति अंग्रेजी की 
सहसा हिन्दी बोली दीर्घ श्वास छोड़कर 
हाँ किसी ने कहा तो ठीक ही है 
बिल्लियों की लड़ाई में फ़ायदा उठाता बन्दर ही तो है 
लेकिन अब हम मूर्खता नहीं करेंगे
आपस में हम अब नहीं लड़ेंगे 
हर षड्यन्त्र अंग्रेजी का
हाँ विफल करेंगे



मौलिक रचना:
दीप्ति मिश्रा
उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)

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