जब हाथों से लम्हा फिसल जाता है - By दीप्ति मिश्रा, उझानी, बदायूं

जब हाथों से लम्हा फिसल जाता है 

जब आँखो में समंदर थम जाता है

जब पैरों के नीचे से खींच ले कोई ज़मी 

जब न रहे सर पे आसमा की चादर तनी 

तब यह पथरीली राहें साथ चलती है हमारे 

देती हैं हौसला चलते जाने का 

काँटों में फूलों में नदिया की बहती धारों में 

क़दमबढ़ाते जाना है पत्थर में फूल खिलाना है 

जीवन हर पल गीत है संघर्षो का 

हमारे कष्टों के नये अवतरणो का 

आशा और निराशा के झूले में -

हिचकोले लेते सम्बन्धों का 

मंज़िल की तरफ़ बढ़ते क़दमों को 

पीछे खींचती जकड़ी ज़ंजीरो का 

खड़ी हैं यही राहें रास्ता रोके हर मुश्किल का।


मौलिक रचना:
दीप्ति मिश्रा
उझानी,  बदायूं  (उत्तर प्रदेश)

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