भारत व चीन में आर्थिक प्रतिद्वन्दता - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मानना है कि पड़ोसी कभी भी बदले नहीं जा सकते इसलिए उनसे भाईचारा बना कर रखना चाहिए तभी उन्होंने जब 26 मई 2014 को प्रथम बार प्रधानमंत्री के पद की शपथ ग्रहण ली तो उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारत के सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंन्त्रित किया था तथा इसके पीछे उनकी मन्शा यही थी कि आओं हम सब मिल कर इस क्षेत्र में गरीबी, बिमारी, अशिक्षा व बेरोजगारी को दूर करें। परन्तु उनकी यह इच्छा कुछ पड़ोसियों की कट्टरवादिता, संकीर्ण विचारधारा तथा हठधर्मिता के कारण पूरी न हो सकी और वे पड़ोसी देश आतंकवाद व कट्ठमुल्लापन के पीछे ही भागते नजर आये। एक कहावत और भी है कि पड़ोसी को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए इससे पड़ोसी से होड़ व प्रतिस्पर्धा बनी रहती है। एक पड़ोसी दूसरे के जैसा बनने तथा आगे निकलने की होड़ में लगा रहता है यदि पड़ोसी ने कुछ हासिल किया तो दूसरा पड़ोसी भी येन - केन प्राकेण उसको हासिल करना चाहता है। यह प्रतिस्पर्धा अच्छी समझी जाती है तथा अधिकतर मामलों में इस प्रवृति से दोनों का कल्याण ही होता है तथा समृद्धि बढ़ती है। एशिया में भारत व चीन जो पड़ोसी देश है, में भी गत 5...