"मिट्टी से पहचान" - By रूपा राजपूत वसुंधरा, गाजियाबाद

अजीब लगा पढ़कर की ये क्या है "मिट्टी से पहचान"? हम क्या करेंगे या हम क्यों करें मिट्टी की पहचान? 

अरे सुनिए तो सही कि मैं कौनसी मिट्टी की बात कर रही हूँ। जी हाँ मैं कोई चिकनी मिट्टी या रेतीली मिट्टी की बात नही कर रही हूँ इन मिट्टी की अपनी विशेषता होती हैअपनी विशिष्ट भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं के माध्‍यम से विभिन्‍न प्रकार की फसलों को लाभ प्रदान करती है। अपितु मैं तो अपने देश की मिट्टी की बात कर रही हूँअपनी मातृभूमि की बात कर रही हूँ, जिसकी महिमा के बारे में हमारे आराध्य श्री रामचंद्र जी ने भी कहा था ''जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी''अर्थात् जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है। हमारे वेद पुराण तथा धर्मग्रंथ शुरू से ही इन दोनों का गुण गान करते आ रहे है, मगर आज हम कही इन दोनों को भूलते जा रहे हैइनकी छवि धूमिल होती जा रही है। इनकी साख आज हमारे व्यवहार और विचारो में कही कम होती जा रही है। आज हर किसी को बस विदेश जाना है वहीं रहना  है  क्यों ? क्योकि वहाँ तनख्वाह अच्छी है। ये बहुत ही निंदनीय विषय है कि जिन लोगो ने डॉक्टर, इंजीनियर या अन्य किसी भी विषय में सफलता या महारत पाई है, वो अपने देश को छोड़कर विदेशो में जाकर बस जाते है। जिस देश में आपने जनम लिया, शिक्षा पाई और जीवन जीने का सलीका सीखा उसी देश को, उसी मिट्टी को छोड़कर चले गए अपने लिए नई राहें, नई उम्मीद एवं नई मंजिले तलाशने!

क्यों? आप भारत में रहकर यहाँ वो सब क्यों नही कर सकते जिसके लिए आप विदेश जाते हो? अगर सब मिलकर प्रयास करेंगे तो किसी भी माँ को अपने बेटे को देखने के लिए बरसो प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। किसी बाप को अंतिम अवस्था में अपने पुत्र को न देख पाने की बोझिल पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ेगा। किसी भी बहन को राखी, भाईदूज पर फ़ोटो से काम नहीं चलाना पड़ेगा। अपने देश को, अपनी मिटटी को मजबूत बनाइये ना। अपनी योग्यता को, अपने हुनर को अपने देश-हित में लगाइये, इस देश को प्रधानमंत्री जी के आवह्न पर आत्मनिर्भर बनाने में अपना सहयोग दीजिये। फिर देखिये कैसे ये भारत फिर से वही "सोने की चिड़िया" बन जायेगा।

अब समय आ गया है कि हम हमारे देश की मिट्टी की सुगंध को आत्मसात करें और अपने देश को प्रेरणास्रोत बनाये दूसरे देशों के लिए। अपने देश से, अपनी मातृभाषा से प्रेम करें और अपने हुनर से भारत को नए आयाम दें, नई पहचान दें और लहरा दें अपने तिरंगे को दुनिया के आसमान पर, नई ऊँचाइयों के साथ।


रूपा राजपूत
वसुंधरा, गाजियाबाद

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