"कन्हैया" - By रूपा राजपूत वसुंधरा, गाजियाबाद

दही - माखन चुराकर कन्हैया बालपन में गोपियों से स्नेह पाया है 🙏
किशोर बन बाँसुरी की मधुर धुन बजाकर सबका दिल चुराया है... 🙏
सुना है यमुना किनारे गोपियो के संग रास रचाते थे तुम कान्हा...🙏
ज्ञानी उद्धव के अहंकार को प्रेम में डूबी गोपियो से तुड्वाया है...🙏 
संहार किया अत्याचारी राक्षसॊ का खेल -खेल में तुमने मोहन🙏
कैसा अजब - गजब सा न्याय घनश्याम जमाने को दिखाया है🙏
बुराई का अंत बुरा ही होता है सीख दी सकल संसार को तुमने कृष्णा  🙏
कंश मामा जैसे पापी को मारकर दुनियां को पाप का अंत दिखाया है🙏
भरी सभा में हाथ बढाये जब निर्लज कौरवॊ ने  द्रोपदी के चीर हरण को🙏
बढाकर द्रोपदी का आंचल ऒ कान्हा तुमने अपना पौरुष निभाया है 🙏  
शूरवीर अर्जुन के युद्ध में हाथ काँपे जब सामने अपनो को देखकर🙏
योगीराज तुमने देकर गीता का उपदेश डगमगाते अर्जुन को क्षत्रिय धर्म सिखाया है🙏
असंख्य लीला दिखाई है तुमने धरा पर जन्म लेकर मेरे मनमोहन 🙏
बाँसुरी बजाने वाले हाथो ने निरंकुश की सजा के लिये सुदर्शन चक्र भी उठाया है... 🙏


स्वरचित:
रूपा राजपूत
वसुंधरा, गाजियाबाद

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