कोरोना वायरस - लोकडाउन - अर्थव्यवस्था | By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 मार्च 2020 की सांय को घोषणा की कि भारत में कोरोना वायरस  से निपटने के हेतु देश भर में 21 दिन का लोकडाउन लागू होगा जो 24-25 मार्च 2020 की आधी रात से से 14 अप्रैल 2020 तक चलेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए व अनुरोध करते हुए अपने सम्बोधन में कहा कि यदि कोरोना वायरस - लोकडाउन में लोग ढ़ंग से स्वंय नियन्त्रित होकर स्वंय को स्वंय के मकान में नहीं ठहरे रहे तो देश 21 वर्ष पीछे चला जायेगा। अभी तो मात्र 21 दिन ही कठिनाई सहन करनी पड़ेगी।

इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 21 मार्च 2020 को घोषणा की थी कि 22 मार्च 2020 को जनता कफ्र्यू लागू होगा जिसमें सभी देशवासी अपने अपने घरों में रहें तथा किसी कार्य हेतू घर से बाहर न जायें तथा सांय 5 बजे अपने घर की बालकनी में आकर घंटे, शंख, ताली, थाली इत्यादि बजा कर उन सेवकों को शुक्रिया अदा करेंगे जो इस भंयकर परिस्थिति में भी लोगों की किसी न किसी प्रकार से सेवा कर रहे है जिनमें चिकित्सक, नर्स, चिकित्सीय कर्मचारी, सुरक्षा में लगे सिपाही, सफाई में लगे कर्मचारी तथा अन्य सभी सेवा में लगे लोग अन्य लोगों की तकलीफों को किसी न किसी प्रकार दूर कर रहे है। इन सबका सम्मान अत्यन्त आवश्यक है। परन्तु लोगों ने 22 मार्च 2020 की सांय को अत्यंत उत्साह में आकर सोशल ड़िस्टेंसी का पालन नहीं किया और सड़कों पर एकत्र होकर थाली, घंटे, शंख तथा तालियां बजाने लगे। वैसे जनता कफ्र्यू सम्पूर्ण देश में सांय 5 वर्ष तक बिल्कुल सफल रहा था। इसी सफलता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 मार्च 2020 को कहा कि लोग स्वंय को मकान के बाहर की लक्ष्मण रेखा को किसी भी कीमत पर पार न करें तथा बहुत आवश्यकता होने पर ही घर से बाहर निकलें क्योंकि लोग घर से बाहर जाने पर ही कोरोना वायरस को अपने घर में आने के लिए आमंत्रित करेंगे। प्रधानमंत्री ने गरीबों के कल्याण के लिए, अन्य अल्प आय वर्गों के लिए जरुरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तथा अन्य चिकित्सीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1,07,000 करोड़ रुपये के अनुदान की घोषणा की। प्रधानमंत्री ने भी कोरोना वायरस  के लिए एक अलग फंड बना कर लोगों से उसमें दान करने की भी अपील की। इस अपील का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और लोगों ने दिल खोल कर आपदा की इस घड़ी में इस कोष में दान दिया। प्रधानमंत्री कोष की तर्ज पर विभिन्न राज्यों ने भी अपने अपने यहां कोष की स्थापना कर जनता से सहयोग की अपील की। 21 दिन के इस कोरोना वायरस - लोकडाउन में 13 दिन कार्यशील तथा आठ दिन अवकाश के थे। इसमें लोगों की कार्य क्षमता पर ज्यादा विपरीत प्रभाव नहीं पड़ने वाला था।

इटली, स्पेन, ब्राजील व ईरान इत्यादि में कोरोना वायरस से जो तबाही हुई उसके सदृश्य भारत में भयंकर स्थिति उत्पन्न न हो उसी के लिए कोरोना वायरस के ईलाज के रुप में घर पर ही रहना (लोकडाउन) एक दवाई के रुप में लोगों को लोकडाउन के बारे में समझाया गया था। 24 मार्च 2020 ईटली में 69,176 , ईरान में 24,811 तथा भारत में 536 लोग ही कोरोना वायरस से संक्रमित थे तथा इटली में 113 व ईरान में 23 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। भारत में चिकित्सकों ने लोगों से कहा कि यदि वे टेलीफोन पर परामर्श लें तो अच्छा रहेगा तथा बहुत आवश्यकता पड़ने पर ही वे चिकित्सालय में आयें। लोग लोकडाउन के दौरान पार्क, समुन्द्र के किनारे, होटलों, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, मस्जिद इत्यादि में एकत्र न हों। 

विश्व के जिन जिन देशों में कोरोना वायरस - लोकडाउन लागू हुआ वहां, यातायात, पर्यटन, तथा मनोरंजन इत्यादि सहित अन्य उत्पादकीय उद्योग भी ठप्प हो गये है। वैश्विक जीड़ीपी में विश्व विचार गोष्ठियों के यातायात का अंश 1.4 प्रतिशत है तथा छुट्टियों के सैर सपाटे का योगदान 3 प्रतिशत है। अमेरिका के जीड़ीपी में 15 प्रतिशत पर वहां के औद्योगिक उत्पादन, शॉपिंग मॉल तथा अन्य कारणों से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तथा अमरिका की शेष 85 प्रतिशत अर्थव्यवस्था भी गड़बड़ा जायेगी। लोग कोरोना वायरस - लोकडाउन इत्यादि से अवसाद, भुखमरी, दुराचारिता, तथा भ्रष्टाचार से नौकरियों पर प्रभाव पड़ने से अमेरिका की 85 प्रतिशत अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है। जिससे क्या अमेरिका सहित अन्य युरोपीय देशों में भी लोगों को अवसाद, भुखमरी, नौकरियों और वेतन के नुकसान से परेशान होकर मृत्यु होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। 

भारत पर प्रभाव

भारत में कोरोना वायरस - लोकडाउन से पूर्व 8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी लागू हो गयी थी जिसका उद्देश्य काले धन को अर्थव्यवस्था में चलन में लाना था तथा उससे 87 प्रतिशत मुद्रा पर प्रभाव पड़ा था। लोग उससे प्रभावित हुए तथा इससे कुछ लोग मारे भी गये पर उनका कोई रेकॉर्ड नहीं है कि कितने लोग नोटबंदी के दौरान मारे गये अथवा कितने लोग नौकरी नहीं कर सके या खर्च करने के लिए वैद्य मुद्रा के प्रभाव से मर गए। ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है। 

इसी प्रकार से कोरोना वायरस - लोकडाउन से लोगों को कुछ मुश्किल हालातों का समाना करने की सम्भावना है।

1.     शहरी क्षेत्र में 25 प्रतिशत जनसंख्या दैनिक मजदूरी पर निर्भर है तथा वे छोटी छोटी कम्पनियों व फर्मों में काम करते है जिससे कोरोना वायरस - लोकडाउन में उनकी आय शुन्य हो गई है।
2.     शहरों में कार्य नहीं मिलने पर मजदूर शहरों को छोड़ कर गांवों की तरफ पलायन कर देते है। परन्तु उन्हें वहां भी कोई मजदूरी प्राप्त नहीं होगी। अपितू भारत में फेल रहे कोरोना वायरस से संकृमित होने का जोखिम उठाते है तथा वहां उसकी चिकित्सा की सुविधाऐं भी बहुत न्यून होती है। 
3.     नवम्बर 08, 2016 में छोटे व्यवसायों ने विमुद्रीकरण की मार झेली थीे। जुलाई 01, 2017 से एकीकृत वस्तु एवम् सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत हुई जिससे छोटे व्यवसायों ने बड़ी कम्पनियों को संगठित करने के लिए बाजार हिस्सेदारी खो दी तथा ऋणों से मुक्त हो गये जिससे बैंकिंग संकट उत्पन्न हो गया।
4.     भारत की लगभग 60-70 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से ग्रामीण भारत में रहती है। गांवों में लौटे मजदूरों को वहां मजदूरी नहीं मिल रही है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर 35 प्रतिशत तक विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
5.     बड़ी लीवरेज्ड़ कम्पनियां जो गत 4 वर्षों से एनेमिक इकोनामी से लड़ रही थी, उनके सामने वित्तीय भुगतान की समस्या भी खड़ी हो गई है।
6.     बैकिंग और वित्तीय प्रणाली को गैर निष्पादित ऋणों की जोखिम हो गई है क्योंकि जो व्यक्ति लाॅकडाउन में बेरोजगार हो गये है उन्होंने क्रेड़िट कार्ड़ सेवा का प्रयोग बंद कर दिया है।
7.     भारतीय वित्तीय बाजार गिरावट की स्थिति में आ रहा है। बीएसई का संसेक्स जो 31 जनवरी 2020 को 40,723 अंक का था वह मार्च 24, 2020 को 26,674 अंक तक पंहुच गया अर्थात लगभग 35 प्रतिशत की गिरावट आ गई।

भारतीय अर्थव्यवस्था में लोकडाउन कई जोखिमों को जन्म देता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि अर्थ की वजाह मानव जीवन को बचाना अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें नीति प्रतिक्रिया का चयन करना मुश्किल होती है। जनसंख्या पर लोकडाउन के सम्भावित प्रभाव का अध्ययन करने के लिए आंकड़े मौजूद नहीं है जिसमें मृत्यु दर भी शामिल है, हालांकि जो भी निर्णय लिये जा रहे है उनसे जोखिमों को दूर करने में सहायता नहीं मिल रही है। अतः आर्थिक रास्ते चुनने में कठिनाई आ रही है। 

अर्थव्यवस्था की सुरक्षा

वित्त मंत्रालय नीति आयोग तथा अन्य सरकारी एजेंसियों से मिल कर देश की अर्थव्यवस्था के लिए सामूहिक रुप से कार्य कर रहा है जिसमें बहुत महत्वपूर्ण तारीखों को विस्तृत किया गया। बड़ी कम्पनियां धन व शेयर मूल्य में मुक्त गिरावट से हैरान व परेशान है उन्हें ऋण चुकाने तथा ब्याज से कुछ माफी मिली है। गत वित्तीय वर्ष में उन्होंने जो अप्रत्यक्ष व प्रत्यक्ष कर दिया था उसके आधार पर उनके लिए स्वचालित ब्याज मुक्त ऋण देने की नीति बनायी जा सकती है। 

कम्पनियां शेयर बाय बैक की नीति पर भी विचार कर सकती है। परन्तु इससे उनकी परिसम्पत्तियों की कीमत स्तर पर अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। कम्पनियां किसी भी कर्मचारी की नौकरी समाप्त नहीं कर रही है। परन्तु कम्पनी अपनी खराब प्रदर्शन से लम्बे समय तक वेतन देने की स्थिति में नहीं होंगी तथा लम्बे खिंचे इस लोकडाउन की आकस्मिक स्थिति से कम्पनियों की वित्तीय स्थिति पर चोट पंहुच सकती है। कम्पनियों ने इस तरह की आकस्मिकता के लिए एक आरक्षित निधि क्यों नहीं रखी।? शेयर खरीदने और पुरस्कृत निवेशकों के अल्पकालीन वित्तीय इंजीनियरिंग खेल ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां कम्पनियों में आकस्मिक धन का कोई महत्वपूर्ण पूल नहीं है। अगर किसी कम्पनी के पास पूंजी का कोई उपयोग नहीं है तो उसे लाभांश के रुप शेयर धारकों को पैसा वापस करना चाहिए। पुराने अच्छे दिनों में कम्पनियों के पास एक छुपा रिजर्व होता था।

सहकारी बीमा कम्पनियों के पास अवास्तविक लाभ और अवमूल्यन किये गये निवेश होते थे परन्तु वर्तमान में कम्पनियों की बैलेंस शाीट, इसके विपरीत कल्पनाशील वित्तीय इंजीनियरिंग के उत्पाद है जो सीईओ व संचालकों इत्यादि को बोनस के रुप में बांट देते है। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कोई विशेष कोष कम्पनियों के पास नहीं रहता है। अब कम्पनियों के पास सरकार के सम्मुख ही सहायता के लिए पंक्तिबद्ध खड़े रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अतः रिजर्व आबंटन को शामिल करने के लिए एक नया कानून होना चाहिए जिसमें ऐसा फंड़ होना चाहिए जो कम्पनी को इस आर्थिक तुफान में भी बचाया जा सके जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई कम्पनी 24-36 महिनों के बीच भी शून्य आमदनी पर जीवित रह सकती हैं। इसके लिए प्रतिवर्ष लाभ का 30 प्रतिशत रिजर्व फंड़ में रखा जाना चाहिए। कैरोना वायरस जैसी महामारी तथा आर्थिक प्रतिकूल परिस्थितियों में इस फंड़ से समाज व कम्पनी के कर्मचारियों की सुरक्षा की जा सके। यह प्रतिबद्धता तथा वित्तीय अनुशासन के अंतर्गत विचारणीय होना चाहिए। इसी प्रकार बैंकों में पर्याप्त तथा नकदी होनी चाहिए जो 36 महिनों के बैंकों के शुन्य राजस्व के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए। एक मुश्त नकदी वास्तव में होनी चाहिए। वर्तमान में एक मुश्त नकदी कम्पनी के बैलेंस शीट में कुछ भी वास्तव में नहीं होती है। 
 
वर्तमान लड़ाई:

भारत की जनता कोरोना वायरस की लड़ाई लड़ने हेतु लोकडाउन झेल रही है। जिसके लिए सरकार जनता के सहयोग से कई काम कर रही है। 135 करोड़ से अधिक की आबादी वाले भारत देश में जीड़ीपी के 0.018 प्रतिशत अर्थात 15,000 करोड़ रुपये के व्यय की घोषणा की गई है जो कि देश में बसे परिवारों के प्रत्येक सदस्य को हाथ धोने के लिए साबुन क्रय करने के लिए ही पर्याप्त होगा अथवा देश में 15,000 बिस्तरों के अस्पताल के निर्माण के लिए ही पर्याप्त होगा जबकि देश की संसद भवन की निर्माण के लिए 25,000 करोड़ व्यय किये जा रहे है। इसे अभी टाला जा सकता है। इसी प्रकार वर्तमान में और भी परियोजनाऐं हो सकती है जिनमें से सरकार रकम निकाल सकती है अथवा उन्हें फिलाहाल बंद अथवा स्थगित कर सकती है। 

शहरी दैनिक मजदूरों को दिहाड़ी की रकम मिलती रहनी चाहिए। वे गांव न जा पांये जिससे वे कौराना वायरस को गांवों में नहीं फैला सकें। छोटे व्यवसाय को वित्तीय सहायता देकर उन्हें हर कीमत पर जिन्दा रखा जाना चाहिए। बड़ी कम्पनियों को भी नकदी की सुई लगानी पड़ेगी क्योंकि उन्होंने कोई सिंकिंग फंड़ नहीं रखा था। तरलता की कमी से बैंकों व वित्तीय फर्मों को भी धन की आवश्यकता की पूर्ति की जानी चाहिए। देश के लिए यह एक परीक्षा की घड़ी है जिसमें देश में जीवन को बचाना उपयुक्त होगा अथवा अर्थव्यवस्था को अथवा जीवन व अर्थव्यवस्था दोनों को बचाना। भारत की अर्थव्यवस्था को इस संकल्प के साथ मजबूत करना पड़ेगा कि सब भारतीय लोग भिक्षावृति, भ्रष्टाचार, दुराग्रह, अकर्मण्यता को त्याग कर भारत के नवनिर्माण में अपनी सम्पूर्ण शक्ति व क्षमता के साथ आगामी कम से कम दस वर्ष के लिए उत्साह व साहस के साथ कार्य करें। सरकार को भी इस समय बहुत कठोर निर्णय लेने होंगे जिसमें सभी देशवासियों के सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता होगी। देश में एक भी दिन ऐसा नहीं जाना चाहिए जिसमें हमारी श्रम व मानव शक्ति धरना, प्रदर्शन, आंदोलन में अपनी उत्पादकता को नष्ट करें। राष्ट्र को प्रथम मानते हुए राष्ट्रीय कार्य में सभी के सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता पड़ेगी।


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल
44 आदर्श काॅलोनी
मुजफ्फरनगर 251001 (उoप्रo)


डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल सनातन धर्म महाविद्यालय, मुजफ्फरनगर (उoप्रo), के वाणिज्य संकाय के संकायाध्यक्ष व ऐसोसियेट प्रोफेसर के पद से व महाविद्यालय के प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त हैं तथा स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार हैं।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रसंग - मन चंगा तो कठौती में गंगा

फौजी बेटा By Atul Rajput

आओ नवजीवन की शुरूआत करें - By Montu Rajput (Bhopal)