महामारियों ने बदला है इतिहास | By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)
वर्तमान में नवम्बर - दिसम्बर 2019 से चीन के वुहान शहर से शुरु हुई नोवेल कौरोना वायरस से उत्पन्न महामारी कोविद-19 ने सम्पूर्ण विश्व के 205 देशों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कोविद-19 महामारी का अभी तक कोई ईलाज चिकित्सक वैज्ञानिक नहीं खोज पाये है। बस मरीजों को तथा सामान्य जनता को यही बताया जा रहा है कि अपने शरीर में वायरसों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी पावर) को बढ़ायें और उसको ही बढ़ाने की कोशिशें हो रही है। इस महामारी में मरीज के फेफड़ों को वायरस के द्वारा जकड़ लिया जाता है तथा सांस अवरुद्ध होने से मरीज तड़फ तड़फ कर अपनी जान दे देता है। मरीज से वायरस का संक्रमरण दूसरे स्वस्थ्य लोगों को मरीज की सांस व सक्रंमित हाथों से लग जाता है जिससे वह भी 10-14 दिन में कोविद-19 का शिकार हो जाता है।
इससे पूर्व भी विश्व में हैजा, पोलियों, प्लेग, कालरा, फ्लू, मलेरिया इत्यादि महामारियों ने मुनष्य के जीवन को खतरे में ड़ाल कर लाखों लोगों की जान ली है। शुरु शुरु में इन महामारियों के ईलाज के लिए का भी कोई टीका, दवाईयां, इंजेक्शन, जड़ी बूंटी नहीं होते है तथा मरीजों में इम्यूनिटी विकसित कर उन पर अंकुश महामारी फैलने के महीनों बाद लगाया जा सका है।
वर्ष 1347 में चीन के जहाज जब इटली के बंदरगाह के किनारे पंहुचे तो जहाजों से बिमार चूहे भी वहां उतर गये और इटली तथा यूरोपीय देशों में प्लेग फैल गया। 1911 में चीन में ही एक अनाम वायरस से मंचुरियन क्षेत्र में फैल कर तबाही मचायी थी तथा बिमारी से बचने के लिए लोगों ने स्वंय को घरों में कैद (लोकडाउन) कर लिया था। वहां की समस्त आर्थिक गतिविधि, उद्योग व व्यापार बंद हो गये थे, यात्राऐं बंद कर सीमाऐं सील कर दी गई थी। लोगों ने मूंह पर मास्क लगाया क्योंकि संक्रमण अधिक था और लाशों के ढ़ेर बदबू छोड़ रहे थे परन्तु वर्तमान में विश्व की रफ्तार अधिक है और लोगों का एक दूसरे देशों में आना जाना निरन्तर तीव्र गति से जारी रहता है तो अब कौरोना वायरस दो महिनों में ही सम्पूर्ण विश्व में फैल गया तथा विश्व में ढ़ाई लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई तथा 33 लाख से अधिक ज्ञात व अज्ञात लोग सक्रंमित हो गये। यदि विश्व में लोगों का आना जाना अधिक तीव्र गति से नहीं होता तो कौरोना वायरस सिमट कर रह जाता। कौरोना वायरस का प्रकोप विश्व के लेागों का जीवन बदल रहा है तथा उनके जीवन स्तर में व रहन सहन के तरीके में बदलाव आ रहा है।
1801 में हैती में गुलामों ने बगावत हुई तो गुलामों ने फ्रांस के साथ समझौता करके तुसैत लोवरतूर ने शासन संभाला। फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट ने हैती में कब्जा जमाने के लिए भेजी गयी सेना में पीत ज्वर (यलोफीवर) फैल गया परन्तु उसका ईलाज बोनापार्ट के चिकित्सकों के पास नहीं था तो उसके बहुत से सैनिक मारे गये और हैती पर कब्जे का उसका अभियान फैल हो गया जिसके दो साल बाद ही फ्रांस ने 21 लाख वर्ग किलेामीटर जमीन अमेरिका को बेच दी। जमीन की इस खरीद व बिक्री को लुईसियाना पर्चेज के नाम से प्रसिद्धि मिली। इस जमीन खरीद से अमेरिका का क्षेत्रफल बहुत बढ़ गया था।
1888 से 1897 के कार्यकाल में राइंड़रपेस्ट नाम के वायरस ने अफ्रीका के 90 प्रतिशत पालतू जानवरों को समाप्त कर दिया था। जिससे भुखमरी से प्रभावित हुई अफ्रीका की अर्थव्यवस्था से यूरोपीय देशों ने वहां अपना साम्राज्य बढ़ा लिया था। 1900 तक अफ्रीका के लगभग 90 प्रतिशत क्षेत्र पर यूरोपीय देशों ने नियंत्रण कर लिया था यदि यह राइंड़रपेस्ट वायरस नहीं आता तो आज अफ्रीका की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत होती।
पन्द्रहवीं सदी के अंत में अमेरिकी महाद्वीपों में यूरोपीय देशों ने प्रसार किया तो वहां हैजा, मलेरिया, प्लेग, चेचक, खसरा, काली खांसी व मियादी बुखार ने अमेरिका के करोड़ों लोग मौत के शिकार हो गये। अमेरिका में जनसंख्या कम होने से जमीन का बड़ा हिस्सा चारागाह तथा जंगल में बदल गया था। कार्बन ड़ाईआक्साइड़ का स्तर कम होने से वहां तापमान गिर गया और लघु हिमयुग देखा गया।
पूर्व में जो महामारियों आयी उनसे भी मनुष्यों का जीवन बदल गया। विभिन्न साम्राज्य तबाह हो गये। विभिन्न साम्राज्यों का विस्तार व सुकंचन दोनों ही हुआ। वर्ष 1641 में उत्तरी चीन में प्लेग फैल गया था ऊपर से सूखे व टिड्डियों का प्रकोप हुआ तो लोगों के पास अनाज ही समाप्त हो गया था ऊपर से विदेशी आक्रमणकारियों ने चीन से मिंग राजवंश को समाप्त कर दिया। मंचूरिया के किंगवंश के राजाओं ने राज किया अर्थात अप्रत्यक्ष रुप से प्लेग जैसी महामारी ने चीन के मिंग राजवंश को ही उखाड़ फैंका था। बिमार व हारी थकी जनता सब देखते ही रह गयी थी।
चैहदवीं सदी के पांचवे दशक के अंत से छढ़े दशक की समाप्ति तक प्लेग का तांड़व यूरोप में हुआ जिससे एक तिहाई जनसंख्या कम हो गई। ब्लैक ड़ेथ अर्थात ब्यूबोनिक प्लेग के कारण मजदूरों की संख्या कम हो गई और खेती पर अधिक मात्रा में प्रतिकूल प्रभाव पड़ा इससे पश्चिमी यूरोप के देशों की सामंतवादी व्यवस्था समाप्त हो गयी जिससे आज की मजदूरी प्रथा ने जन्म लिया तथा ये पश्चिमी यूरोप के देश नकदी आधारित अर्थव्यवस्था अपनाने लगे। आर्थिक रुप से सम्पन्न हुए इन देशों ने समुद्री यात्राओं से साम्राज्यवाद को प्रारम्भ कर दिया। जब पश्चिमी यूरोपीय देश अन्य देशों में गये तो वहां शासन के लिए कब्जा करके उपनिवेशवाद शुरु हो गई और पश्चिमी यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो गई। इससे अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण हो गया और उद्योगों ने उत्पादन की नई नई तकनीकें विकसित करनी शुरु कर दी। इससे पश्चिमी यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो गई। यूरोपीय देशों ने अन्य देशों को अपना उपनिवेश बना कर उनके शोषण का कार्य शुरु कर दिया। इससे विश्व में बहुत से यूरोपीय देशों का दबदबा हो गया और वे स्वंय विकसित देश कहलाने का गौरव प्राप्त करने लगे।
यह भी देखा गया है कि सक्रंमित बिमारी से लोगों में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है कौरोना वायरस से भी दो तीन साल में हड़ऱ् इम्यूनिटी विकसित हो सकती है। इस वायरस का प्रकोप गर्मी के मौसम में कम हो जाता है तथा सर्दी के मौसम में यह पुनः जागृत हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लॅाकड़ाउन से कौरोना वायरस का संक्रमण कम होता देखा जा रहा है इसमें फिजिकल ड़िस्टेंसिंग व मास्क उपयोगी सिद्ध हो सकते है। महामारियां जब फैलती है तो वे ईलाज उपलब्ध न होने के कारण तेजी से फैलती है परन्तु प्रयोगशालाओं में उनके लिए ईलाज भी तलााश कर लिया जाता है परन्तु इतना जरुर है कि महामारी के दौरान लोगों की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक क्रियाकलापों के साथ उनके रीति रिवाज, विभिन्न रस्में, रहन सहन का स्तर तथा लोगों का सोचने का ढ़ंग एकदम बदल जाता है। हम सामूहिक होकर बहुत से रीति रिवाज व रस्म निभाते है, हो सकता है कि कौरोना वायरस के भय के कारण लोगों में सामूहिकता व सामाजिकता कम हो जायें, जहां वे एक प्लेट व बर्तन में आठ-दस लोग खाना खा लेते थे व एक बर्तन से ही मूंह लगा कर पानी पी लेते थे, इकट्ठे हो कर दैनिक प्रार्थना करते थे, शादी व ब्याह इत्यादि में भारी मात्रा में लोगों को इकट्ठा कर लिया जाता था, अर्थी व जनाजे के पीछे सैंकड़ों लागे चलते थे। अब हो सकता है कि लोगों की सोच में परिवर्तन हो जाये। शादी व ब्याह व रीति रिवाजों पर जहां व्यय की मात्रा कम होगी तो उसका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा ही। लोग अनुशासित होकर इस कौरोना वायरस से लड़ें तो उससे इस पर निश्चित रुप से विजय प्राप्त हो सकेगी।

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