जिक्र है फ़िक्र है - By स्वo रामवीर सिंह राजपूत Rv Singh Rajput (10-04-2014)

जिक्र है फ़िक्र है, दिल के शहर में,
हलचल सी है, हर एक पहर में।

आग है कभी, कभी धुआं सा उठे,
खलिश ये हवाओं की, सब कुछ कहे,
उम्मीदों की बारिशें, भीग जाने की कोशिशें,
ठंडक है फिज़ा की हर एक लहर में,
जिक्र है फ़िक्र है, दिल के शहर में,
हलचल सी है, हर एक पहर में ।।1।।

ख्वाब हैं बंधे बंधे, लब हैं सिले हुए,
दिल बेचारा कब तक, सब कुछ सहे,
लोक लाज की बंदिशें, बिखर जाने साजिशें,
बेचैनी है धड़कन के हर ठहर में,
जिक्र है फ़िक्र है, दिल के शहर में,
हलचल सी है, हर एक पहर में ।।2।।


स्वरचित: रामवीर सिंह राजपूत

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