कौरोना वायरस से लड़ने हेतू कट्टरपंथी नहीं अपितू असली पंथनिरपेक्षी बनने का समय - By डाॅo सूर्य प्रकाश अग्रवाल (Dr. S.P. Agarwal)
नवम्बर-दिस्म्बर 2019 से चीन से सम्पूर्ण विश्व में फैले नोवेल कौरोना वायरस-कोविद 19 की बिमारी ने अप्रैल-मई 2020 आते आते विश्व में महामारी का एक तुफान खड़ा कर दिया तथा विश्व में सभी समाज के लोगों की आकस्मिक मौत हो रही है। जिसका आंकड़ा लाखों में पंहुच गया है। सभी देशों को सामजिक, आर्थिक व राजनीतिक परेशानी उठानी पड़ रही है। विश्व में भुखमरी, बेरोजगारी, शारीरिक शक्तिहीनता, सहित अनेक तरह की दिक्कतों की ओर सम्पूर्ण समाज ही अग्रसर हो रहा है।
विभिन्न पंथों के समुदायों के लोगों के आपसी भाईचारे में पलीता लगाया जा रहा है। मजहब विशेष के अनुयायी लोगों में कुछ अनपढ, जाहिल, आसामाजिक व कट्टरपंथी लोग अफवाह व गैर सामाजिक बातें फैलाते है जिससे समाज में विस्फोटक स्थिति बन जाती है। वे केवल स्वंय के मजहब को सर्वोत्तम समझ कर कोविद 19 की बिमारी का ईलाज न करवा कर मौत की गोद में जाने को तत्पर हो रहे है। यदि कोई व्यक्ति मौत के बाद प्राप्त होने वाली काल्पनिक सुविधाओं से आकर्षित होकर मौत को गले लगा रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है परन्तु मौत होते होते वह व्यक्ति बहुत से अन्य व्यक्तियों को मौत की सौगात क्यों बांट रहा है?
कौरोना वायरस से उत्पन्न बिमारी कोविद 19 जिस प्रकार से एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे में चली जाती है तो इससे समाज में चिन्ता का वातावरण बनना स्वाभाविक है क्योंकि संक्रमण गरीब, अमीर, मजहब, धर्म, शहरी अथवा ग्रामीण नहीं देखता है। परन्तु कुछ विशेष समुदाय के लोग समझ रहे है कि वे तो अल्लाह ताला के नजदीक जाकर ज्यादा शबाब प्राप्त कर लेंगे और दूसरे मजहब के लोगों का सर्वनाश कर देंगे तो उनके इस कृत्य से अल्लाह ताला बहुत खुश हो जायेंगे। उनके सहधर्मी लोग विश्व में जिन्दा रहें तथा उनसे अलग दूसरे धर्म के अथवा पंथ के लोग विश्व में जिन्दा ही न रहे अथवा विश्व में जब उनके मजहब वालों का ही राज होगा तब ही सब ठीकठाक होगा तथा गैर मजहब के लोग उन पर किसी प्रकार राज नहीं कर सकते अथवा गैर मजहब के लोगों को कत्ल करके अथवा मार कर स्वंय को जन्नत नसीब होगी। यह एक गैर सामाजिक सोच है। सम्पूर्ण विश्व हमारा कुटुम्ब है तथा सभी धर्मों के मानने वाले लोग मेरे भाई है, की सोच विकसित होनी चाहिए थी तथा लोगों को स्वंय के मजहब के बारे में कट्टरपंथी सोच पर दुबारा से सोच विचार कर मान्यताऐं बनानी चाहिए। हम किसी भी मान्यता पर अपनी आस्था रख सकते है तथा आस्था मात्र एक विश्वास है। उसको विज्ञान की तरह किसी भी तरह प्रयोगशालाओं में सिद्ध किया नहीं किया जा सकता है। जब जब मान्यताओं को प्रयोगशालाओं में सिद्ध किया गया अथवा सिद्ध करने की कोशिश की गई तो समाज ने कट्टरपंथियों के द्वारा हल्ला-गुल्ला किया गया परन्तु अंत में विजय विज्ञान को ही प्राप्त हुई तथा मान्यताऐं धीरे धीरे बदली चलर गयी जैसे ही हम महान वैज्ञानिक गैलिलियों व अन्य वैज्ञानिकों के साथ समाज के क्रुरतम अत्याचार को देखते है।
अज्ञात दैवीय शक्तिओं पर मान्यताऐं निर्धारित करके धर्म, मजहब तथा पंथ बनाये जाते है, यह धरती पर रहने वाले लोगों का काम रहा है। दैवीय शक्तियां सम्पूर्ण समाज के कल्याण के लिए ही काम करती है। धरती पर रहने वाले लोग किसी न किसी विचार से पूर्वग्रहीत रहते है अतः उनके द्वारा निर्धारित मान्यताओं को पंथनिरपेक्ष नहीं कहा जा सकता है। वर्तमान में चल रहे कौरोना वायरस का कहर में भी कुछ कट्टरपंथी लोगों की सोच व उनसे उपजी हरकतें गैर सामाजिक कही जा सकती है। इसे विड़म्बना कहा जाय अथवा जानबूझ की सोच समझ क्र ऐसी लापरवाही जिससे समाज का विघटन हुआ। उनकी इस कार्यवाही में तथाकथित बुद्धिजीवी व पढ़े लिखे लोगों ने अपनी पंथनिरेपक्षिय समझदारी नहीं दिखायी तथा जानकारी को छिपा कर अपने व दूसरे समुदायों के लोगों को संक्रमित करके मौत के मुँह में धकेल दिया व संकट में ड़ाल दिया। प्र्रतिष्ठित इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर शाहिद अंसारी ने तब्लीगी जमात में सहभागेदारी को चिकित्सकों व पुलिस से छिपाई जिससे उनका परिवार, विश्वविद्यालय तथा विभाग के लोग ही बिमारी के संकट में फंस गये। प्रयागराज के अब्दुल्ला मस्जिद के प्रबंधकों ने भी तथ्य छिपाये कि उनके यहां इंड़ोनेशिया से सात जमाती ठहरे हुए है। नरसिंहगढ़ की मस्जिद में भी दिल्ली से 11 जमातियों की सूचना छिपाई गई। इसी प्रकार 13 मार्च 2020 को एक रेलवे अधिकारी ने अपनी पुत्री के घर में न होने की जानकारी नहीं दी जबकि बेटी के संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी।
ऐसे अनेकों उदाहरण है जहां पढे लिखे शिक्षित व समाज के जिम्मेदार लोगों ने अपनी कट्टरपंथी सोच के चलते लोगों को सक्रंमित करके संकट में ड़ाल दिया। ये सभी लोग इस बिमारी की भंयकरता से पूर्ण रुप से परिचित थे उनको अनपढ कतई नहीं कहा जा सकता। दिल्ली से चल कर प्रयागराज पंहुचते पंहुचते न जाने कितने लोग जैसे रिक्शा वाला, टैक्सी वाला, रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए सहयात्री इत्यादि हजारों लोग उनसे सक्रंमित हो गये होगें। वे रेल यात्री भी प्रयागराज से आगे और कितने स्टेशनों पर उतर कर अन्य लोगों को सक्रंमित करते हुए जा रहे होंगे। दिसम्बर 2019 से मार्च, अप्रैल 2020 तक इस बिमारी के विषय में विस्तृत जानकारी सूचनातंत्रों के द्वारा सभी लोगों (मात्र जाहिल व मजहब के प्रति स्वार्थी लोगों को छोड कर) को हो गई थी। परन्तु वे लोग स्वंय ही स्वास्थ्य कर्मियों के पास नहीं गये और अपना ईलाज शुरु नहीं किया। जो उनसे उनके स्वास्थ्य के विषय में जानकारी लेने अथवा ईलाज करने आया उस पर पत्थर बरसा दिये।
कौरोना वायरस ने सम्पूर्ण विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। इससे मुक्त होने में कितना समय लगेगा यह निर्धारित नहीं है परन्तु इससे निपटने के उपरान्त विश्व के सभी समाजों में सामाजिक, आर्थिक, व्यापारिक व्यवहार में बहुत बदलाव देखा जायेगा। सभी देशों की सरकारें भी अपनी प्राथमिकताओं तथा योजनाओं को लेकर नए पहलुओं पर ध्यान देते हुए पुनः विचार करने को मजबूर होंगी अर्थात अब दुनिया पहले जैसे नहीं रहेगी। प्रत्येक देश अब ज्यादा संकीर्णता, जड़ता, धर्माधंता तथा स्वार्थपरकता को लेकर विचार करेगा।
कौरोना वायरस सबसे पहले चीन में दिखाई दिया तथा चीन ने लापरवाही करते हुए देरी से विश्व को बताया तथा कौरोना वायरस से हुई महामारी के लिए सीधे सीधे चीन ही जिम्मेदार है परन्तु चीन इसके लिए न तो स्वंय को दोषी मानता है तथा तथाकथित अन्य देशों के कम्यूनिस्ट विचारों वाले बुद्धिजीवी भी खतरनाक खामोशी के साथ ध्रतराष्ट्र सरीखें हो गये है। चीन लगातार यह सिद्ध करने की कोशिश कर रहा है कि कौरोना वायरस किसी दूसरे देश से उसके यहां आया। उसने सुरक्षा परिषद में भी इस संकट पर चर्चा तक नहीं होने दी। अमेरिका उसके आचरण तथा कृत्य की आलोचना अवश्य कर रहा है जबकि अन्य देश उसकी आलोचना करने का साहस भी किसी अपरिहार्य कारणों से नहीं कर पा रहे है।
भारत में कौरोना वायरस के इस तुफान को देखते हुए एकजुटता देखी जा रही है। परन्तु 25 मार्च 2020 के बाद से भारत में संक्रमितों की संख्या में भारी उछाल आ गया। इस उछाल की जांच मे पता चला कि दिल्ली में निजामुद्दीन क्षेत्र में मरकज में तब्लीगी जमात ने खेल कर दिया है। इस जमात में हजारों देशी व विदेशी लोगों ने अपनी उपस्थिति 13 मार्च 2020 से पूर्व से ही दी। अब कौन सा व्यक्ति कहंा से सक्रंमित होकर उस भीड़़ में आ गया तथा आयोजकों ने स्वंय पहल करके सरकार को अपने एकत्रीकरण की बात भी नहीं बतायी तथा दिल्ली से सभी लोग देश के विभिन्न भागों में चले गये और रास्ते में तथा देश की मस्जिदों में हजारो अन्य लोगों को सक्रंमित कर दिया। पुलिस के बार बार कहने पर भी ये लोग स्वंय स्वास्थ्य परीक्षण हेतु बाहर नहीं आये। अब सरकार के सामने एक विचि़त्र स्थिति पैदा हो गई कि वह कौरोना वायरस के रोकने के लिए लाॅकड़ाउन की व्यवस्था को देखे अथवा दिल्ली की इस मरकज के लोगों को तलाश करें। इस मरकज के जमातियों के समर्थकों ने पुलिस तथा चिकित्सा कर्मियों पर हमले कर उनको घायल कर लहूलुहान भी कर दिया तथा स्वंय को क्वांरटाइन होने से इंकार कर दिया। उनके दिमाग में किसी ने यह बैठा दिया कि अगर मस्जिद में तुम्हारी मौत होगी तो मौत के बाद तुम्हें बहुत बड़ा शबाब मिलेगा। मौत तो अल्लाह ताला की मर्जी से होती है वो स्वंय मरे तो मरें परन्तु दूसरों को क्यों सक्रंमित करंे। मरकज से निकले लोग स्वंय को ईस्लाम का प्रचार करने वाला बताते हुए दीनी कार्य में रत् रहने वाले बताते है जबकि उनका कार्य गम्भीर, राष्ट्र विरोधी व घोर रुप से गैर मजहबी है।
इन जमातियों ने कौरोना वायरस से लड़ाई को और कठिन बना दिया है तथा यह शिकायत कर रहे है कि कौरोना वायरस में उनकी संस्था का नाम बदनाम किया जा रहा है अर्थात चोरी व सीनाजोरी तथा समस्त देश को गम्भीर खतरे में ड़ालने वाला व्यवहार है। वे अन्य मुसलमानों को भी सरकार के विरुद्ध भड़काते है कि सरकार उनके मजहबी कार्य तथा नमाज इत्यादि में हस्तक्षेप करते हुए मस्जिदों को बंद करने का षड़यंत्र कर रही है तो अनपढ़ व जाहिल लोग जो बड़ी तादाद में है, वे लोग झुंड़ बना कर सड़क पर उतर आते है। तब्लीगी जमाती जैसे संगठन इस विकट समस्या में अपनी कट्टरता को नहीं छोड़ सकने की सीख अपने समुदाय को नहीं दे पा रहे तो इनसे शंाति काल में किसी सीख की आशा करना ही बेमानी होगा।
उन्हें अपनी संकीर्णता से ऊपर उठ कर अपनी क्षुद्रता को छोड़ना चाहिए। कुछ नेताओं तथा बुद्धिजीवियों का आचार व व्यवहार भी गम्भीर संकीर्णतापूर्ण है। वे देश की सरकार व राष्ट्र को ही अस्थिर करने की कोशिश कर रहे है। इस महामारी में भी ऐसे लोग सरकार के विरुद्ध राजनीतिक लाभ उठाने की जुगत कर रहे है। ऐसे लोग लोकडाउन में छोटी छोटी समस्याओं और मजबूरियों को लेकर उनको भीषण रुप देते हुए देखे जा रहे है। सोशल मीड़िया पर फर्जी समाचारों के माध्यम से समाज में गलत फहमी फैला कर सरकार, पुलिस व चिकित्साकर्मियों के सम्मुख अव्यवस्था उत्पन्न कर रहे है।
कांग्रेस के एक नेता ने गलत को गलत कहते हुए साहसिकता का परिचय देते हुए 11 अप्रैल 2020 को कहा कि तब्लीगी जमात के जमावाड़े और कौरोना पर उसके गैर जिम्मेदार व्यवहार पर गम्भीर सवाल उठाते हुए उनकी तीखी आलोचना की उन्होंने कहा कि एक समय आता है जब गलत को गलत कहना ही पड़ता है उन्होंने अपने ट्विटर हैंड़ल पर लिखा कि तब्लीगी जमात से भारत ही नहीं अपितू पूरी दुनिया को सावधान रहना होगा। पाक के ज्यादातर कौरोना वायरस के संक्रमण के ममाले जमात से जुड़े हुए है। जबकि वे भारत के 30 प्रतिशत से ज्यादा संक्रमितों के जमातियों से जुडे होने के मामलों के विषय में कुछ नहीं कहते है।
भारत में प्रगतिशील समाज में जमात को लेकर निंदा का सुर धीमा देखा गया है। उससे ज्यादा खिलाफ व सख्त रुख तो पाकिस्तान व ईस्लामी देशों में दिखायी दिया है। कांग्रेस के नेता ने आगे कहा कि अगर मुख्यधारा के मुसलमान ऐसी घटनाओं की निंदा नहीं करेंगे तो लोंगों को मुसलमानों की तुलना जमात से करने का मौका मिल जायेगा अर्थात कांग्रेस नेता जी को अन्य धर्म के कट्टरपंथियों के मजबूत होने का ड़र सता रहा है।
भारत सरकार व उसके समर्थक लोग बिमारी की इस चुनौती के मद्देनजर मानवता के हित मे विज्ञान तथा चिकित्सा विज्ञान का प्रयोग कर रहे है। कट्टरपंथ से दूर होने का प्रत्येक स्तर पर पंथनिरपेक्षता की सोच से ओतप्रोत भारतीय संस्कृति के लिए अनुशासन में रह कर कार्य कर रहे है। सम्पूर्ण समाज इस विपत्ती में व इसके बाद शांतिकाल में भी भारत में कट्टरपंथी व्यवहार की अपेक्षा असली व वास्तविक पंथनिरपेक्षी सोच के समाज को बनाने की आवश्यकता है। अपने पंथ के साथ साथ हम सम्पूर्ण समाज को बचा कर इस विपत्ति से बाहर निकालने को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

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