मजबूर मजदूर - By नीमा शर्मा 'हँसमुख' जी, नजीबाबाद

कंधे पर बोझ लिए
चलता रहा पथ पर।
फैला चारों और सन्नाटा,
मीलों का सफर।
अनसुलझी गुत्थी सुलझाता
चला जा रहा मैं पथ पर।
महामारी का डर,
फिर भी निडर।
अपनों से मिलने की चाह
चला हूँ मैं पथरीली राह।
थके पाँव,
लगे कई घाव।
भूख है प्यास है,
मंजिल की आस है।
मैं पहुँचूँगा या नहीं,
यही डर मन में लिए।
आगे बढ़ता जा रहा हूँ मैं,
चलता जा रहा हूँ मैं।
अपने घर अपने गाँव,
जहाँ मिलेगी अपनो की छाँव।
मै मजदूर हूँ, मजबूर हूँ।
झेल रहा महामारी का वार,
चला हूँ अपनों का पाने प्यार।
मै मजदूर हूँ, मजबूर हूँ।


नीमा शर्मा 'हँसमुख' जी, नजीबाबाद (बिजनौर)

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