चीन की दीवार या कुम्बलगढ़ की दीवार? - सम्पादित अंश मनीष सोनी जी
हमें मार्केटिंग करनी ही नहीं आई। सिर्फ एक दीवार के सहारे चीन करोड़ो रूपये की कमाई करता है पर्यटन से। बच्चे भी जानते हैं चीन की दीवार सबसे लम्बी है पर भारत में सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे पुरानी निर्मित और दूसरी सबसे बड़ी दीवार कौनसी है? नही पता होगा।
राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित कुंभलगढ़ किला और इस किले की दीवार विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है जो 36 किलोमीटर लम्बी है और 15 फीट चैड़ी है। कहा जाता है इस पर एक साथ पाँच घोड़े दौड़ सकते हैं। किले के अंदर 360 से ज्यादा मंदिर हैं जिनमें से 300 प्राचीन जैन मंदिर और बाकी हिन्दू मंदिर हैं। यह एक अभेद्य किला है जिसे दुश्मन कभी नहीं जीत पाए। किले के चारों ओर बड़ी दीवार बनी हुई है जो चीन के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है।
राजस्थान के आमेर, जैसलमेर, रणथम्बौर, चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ किले को साल 2013 में वल्र्ड हेरिटेज साइट की सूची में शामिल किया गया है। मेवाड़ का इतिहास अपने-आप में इतना समृद्ध और गौरवशाली हैं कि यहाँ के प्रत्येक क्षेत्र, किले, महल और अन्य किसी भी ऐतिहासिक-स्थल के बारे में जानना स्वतः रुचिकर हो जाता है। इसी क्रम में कुम्भलगढ़ किले का इतिहास भी काफी रोचक एवं आकर्षक है। राणा कुंभा ने 1458 ईस्वी में कुम्भलगढ़ बनवाया था, इसीलिए इसका नाम कुम्भलगढ़ है। किले का निर्माण अशोक के पोते जैन राजा सम्प्रति के खंडरों पर हुआ था। राणा कुम्भा सिसोदिया वंश के राजा थे उन्होंने वास्तुकार मंदान को किले की वास्तुकला निर्धारित करने का काम सौंपा था। इसे बनाने में लगभग 15 वर्ष लगे थे। राणा कुम्भा का साम्राज्य मेवाड़ से ग्वालियर तक फैला हुआ था। अपने राज्य को सुरक्षित करने के लिए राणा कुंभा ने कुम्भलगढ़ किले के अतिरिक्त 31 अन्य किले भी बनवाए थे जबकि एक अन्य तथ्य के अनुसार उन्होंने अपने पूरे साम्राज्य में कुल 84 किले बनवाये थे। ऐसा माना जाता है कि वास्तव में राणा कुम्भा ने कुम्भलगढ़ नहीं बनाया था। किले के 15वीं शताब्दी के पहले से होने के प्रमाण मिले हैं। साक्ष्यों के अनुसार प्रारम्भिक किला मौर्य काल के राजा सम्प्रति ने छठीं शताब्दी में बनवाया था और इसका नाम मचिन्द्रपुर रखा था। तत्कालीन किला राणा कुंभा ने बनवाया है।
किले को बनाने की शुरुआती प्रक्रिया बेहद मुश्किल थी। इसकी दीवार बनने से पहले ही गिर गयी थी। इसके बाद एक साधु की सलाह पर मेहर बाबा नाम के व्यक्ति की मानव बलि दी गयी थी। पारम्परिक तौर पर उसके सर को धड़ से अलग किया गया, जहाँ उनका सर अलग हो गया और लुढ़ककर जहाँ जाकर रुका वहाँ पर मंदिर का निर्माण करवाया गया और जहाँ पर धड़ गिरा था वहाँ पर दीवार का काम शुरू करवाया गया। 19 वीं शताब्दी के अंत में राणा फतेह सिंह ने इस गढ़ का पुनरुत्थान करवाया था। किले के इतिहास में मेवाड़ी शासकों के संघर्ष और शासन से जुडी कई कहानियाँ हैं। राणा कुम्भा के पास बहुत सारे तेल के लैंप थे जिसे वो हर शाम को लगाते थे, इसके पीछे उनका उद्देश्य किले के नीचे काम कर रहे किसानों तक रोशनी पहुँचाना था। हांलांकि ये भी माना जाता है कि जोधपुर की रानी को इन लाइट्स और राणा कुम्भा के प्रति बहुत आकर्षण हो गया था और वो कुम्भलगढ़ किले तक आ गयी थी लेकिन कुम्भा ने इस असहज स्थिति को सहज करते हुए उन्हें अपनी बहन का सम्मान दिया था। राणा कुम्भा जब 1468 में प्रार्थना कर रहे थे तब उनके बेटे उदय सिंह प्रथम ने उन्हें मार दिया था। हांलांकि उनकी हत्या कुम्भलगढ़ किले में नहीं की गयी थी बल्कि चित्तोड़ के एकलिंग जी मंदिर में की गयी थी, लेकिन कुम्भलगढ़ अपने निर्माता की हत्या का साक्षी रहा था। बहुत सारे युद्ध के साक्षी रहे इस गढ़ को भेदना आसान नहीं रहा है। राजपूत राजाओं ने खतरे की स्थिति में कई बार किले के महलों में शरण ली थी।
अल्लाउदीन खिलजी ने किले पर आक्रमण किया था इसके बाद दूसरा आक्रमण गुजरात के अहमद शाह ने किया था लेकिन उसे असफलता मिली थी। अहमद शाह ने बनमाता मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। हांलांकि ये भी माना जाता हैं कि देवताओं ने किले को आक्रमण और क्षति से बचाया था। महमूद खिलजी ने 1458, 1459 और 1467 में किले पर आक्रमण किया लेकिन वो किला जीत नहीं सका था। अकबर, मारवाड़ के राजा उदय सिंह, आमेर के राजा मान सिंह और गुजरात के मिर्जा ने भी किले पर आक्रमण किया था। राजपूतों ने पानी की कमी के कारण समर्पण कर दिया था। वास्तव में कुम्भलगढ़ किले ने केवल एक युद्ध में हार का सामना किया था जिसके पीछे पानी की कमी होना कारण था। ये माना जाता है कि 3 बागवानों ने किले के साथ विश्वासघात किया था। अकबर का सेनापति शाहबाज खान ने किले को अपने नियन्त्रण में ले लिया था। 1818 में मराठो ने किले पर कब्जा कर लिया।
1535 में जब चित्तौड़गढ़ किले पर मुगलों का आधिपत्य हो गया तब राणा उदय सिंह काफी छोटे थे। उस समय उन्हें कुम्भलगढ़ किले लाया गया था और यहाँ पर उदय सिंह को सुरक्षित रखा गया था। पन्नाधाय ने अपने बच्चे का बलिदान देकर राजवंश की रक्षा की थी। उदय सिंह ही वो राजा थे जिन्होंने उदयपुर को बसाया था। किले में लाखो टैंक भी हैं जिसे राणा लाखा ने बनवाया था। किले में एक सुंदर महल भी हैं जिसका नाम ‘‘बादल महल’’ है, जिसे बादल का महल भी कहा जाता है। यहाँ पर महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। कुम्भलगढ़ किला राजस्थान में चित्तौडगढ़ के बाद दूसरा सबसे बड़ा किला है। ये उदयपुर से 64 किलोमीटर दूर राजसमंद जिले में पश्चिमी अरावली की पहाड़ियों में स्थित है। 13 पहाड़ियों पर बना किला समुद्र तल से 1914 मीटर ऊँचा है। किले की लंबाई 36 किलोमीटर है जिसके कारण इसने अंतर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया है। किले की दीवार 38 किलोमीटर तक फैली हुई है। किले की दीवार इतनी चैड़ी हैं कि इस पर 8 घोड़े एक साथ खड़े हो सकते हैं। किले में सात दरवाजे हैं। किले में बहुत से महल, मंदिर और उद्यान हैं जो इसे आकर्षित बनाते हैं। किले में 360 से ज्यादा मंदिर हैं। इन सब में शिव मंदिर सबसे महत्वपूर्ण है, जिसमें एक बहुत बड़ा शिवलिंग है। यहाँ बहुत से जैन मंदिर भी है। किले में स्थित जैन और हिन्दू मन्दिर उस समय के राजाओं की धार्मिक सहिष्णुता को दिखाते हैं कि कैसे उन्होंने ध्रुवीकरण करते हुए जैन धर्म को भी राज्य में प्रोत्साहान दिया था।
कुम्भलगढ़ किले के रास्ते में घुमावदार सड़क आती हैं और आस-पास गहन जंगल दिखाई देता है। ये रास्ता अरैत पोल में खुलता है, जहाँ से वाच-टावर और हुल्ला पोल, हनुमान पोल, राम पोल, भैरव पोल, पघारा पोल, तोप-खाना पोल और निम्बू पोल रस्ते में आते हैं। महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था।
- सम्पादित अंश मनीष सोनी (मूल लेखक अज्ञात)

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