"जय माँ सरस्वती" -:सरस्वती वन्दना:- स्वरचितः विपुल राजपूत ‘माहियान’ वीणा धारिणी, हंस वाहिनि, वैभवशालिनि, शारदे माँ, दूर करो अज्ञान-अंध को, ज्ञान-प्रकाश बढ़ाओ माँ। दीप जला हम , करें अर्चना, फल मेवा स्वीकार करो, ज्ञान-चक्षु देकर के हमको, सब गुण-ज्ञान भरो ऐ माँ। वीणा धारिणी, हंस वाहिनि, वैभवशालिनि, शारदे माँ, दूर करो अज्ञान-अंध को, ज्ञान-प्रकाश बढ़ाओ माँ। । सात सुरों की देवी तुम हो, सब संगीत तुम्ही से है, शब्द-शब्द और गीत-गीत में, वास तुम्हारा ही है माँ। वीणा धारिणी, हंस वाहिनि, वैभवशालिनि, शारदे माँ, दूर करो अज्ञान-अंध को, ज्ञान-प्रकाश बढ़ाओ माँ। । ऋषि मुनियों ने समझा तुमको, वेद पुराणों की भाषा, बैठ मन्थरा की बाणी पर, असुर-संहार कराया माँ। वीणा धारिणी, हंस वाहिनि, वैभवशालिनि, शारदे माँ, दूर करो अज्ञान-अंध को, ज्ञान-प्रकाश बढ़ाओ माँ। । इतनी सी हम आस हैं लेकर, आये तेरी शरण में माँ, दूर करो अज्ञानता मन से, अपना प्यार हमें दो माँ। वीणा धारिणी, हंस वाहिनि, वैभवशालिनि, शारदे माँ, दूर करो अज्ञान-अंध को, ज्ञान-प्रकाश बढ़ाओ माँ। । कमल विराजी, सरस्वती माँ, दे दो ये आशीष हमें, विद्या, सुर और ...
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