नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को समझने की जरूरत है - By Dr. Rajkumar Agarwal
पढ़-लिखकर अच्छे अंक प्राप्त करने के पश्चात् भी यदि हम अच्छे और बुरे में अंतर स्पष्ट नहीं कर सकते तो हमारे पढ़ने-लिखने का औचित्य ही समाप्त हो जाता है। इससे अच्छे तो वे सभी व्यक्ति होते हैं जो किसी कारणवश पढ़-लिख नहीं पाते, परन्तु अपने अनुभव व सामान्य ज्ञान से अच्छी व बुरी बातों का स्पष्ट अंतर बता देते हैं। CAA कानून पर जो भी अमर्यादित व्यवहार हुआ है, उसमें उन कम पढ़े-लिखे लोगों की गलती नहीं है, बल्कि पढ़े-लिखे तथाकथित विद्वान लोगों की गलती है जो उन्हें अपनी विचारधारा के हिसाब से उसके अवगुण गिना रहे हैं। चलिए आज एक निष्पक्ष तरीके से CAA कानून के बारे में बात करते हैं -
1. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) क्या है? 12 दिसम्बर 2019 को संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों (हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी) को जो धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के आधार पर भारतवर्ष की नागरिकता प्रदान करता है तथा इन्हें आवश्यक रूप से 31 दिसम्बर 2014 तक भारतवर्ष में होना चाहिए।
2. इस कानून को लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जब इस देश का विभाजन हुआ तो हिन्दुस्तान व पाकिस्तान बना। प्रारम्भ में हमारा देश धर्मनिरपेक्ष (पिछले 5000 वर्षों से तथा संविधान में न लिखे होने के बावजूद भी यहाँ पर सभी धर्मों के अल्पसंख्यकों को हिन्दुओं ने समुचित आदर दिया, परन्तु वहीं पर इसी हिन्दुस्तान में कुछ कहानियाँ जैसे वीर हकीकत राय की भी है, जिसे एक विशेष धर्म के ना अपनाने पर मार डाला गया था। हिन्दुओं की प्रार्थना में ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ की भावना है, जबकि शायद ही किसी और धर्म में ऐसा हो) तथा पाकिस्तान भी कथित धर्मनिरपेक्ष बना, परन्तु शीघ्र ही पाकिस्तान इस्लामिक देश बन गया और हमने अपने संविधान में धर्मनिरपेक्ष लिख दिया। बँटवारे के पश्चात् नेहरू-लियाकत समझौता हुआ, जिसमें कहा गया कि दोनों देश अपने-अपने अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा करेंगे। विभाजन के समय पाकिस्तान में लगभग 23 प्रतिशत हिन्दुओं की आबादी थी और भारतवर्ष में लगभग 9 प्रतिशत मुसलमानों की आबादी थी। समझौते के अनुसार भारत के मुसलमानों को इतनी धार्मिक आजादी मिली कि वह अब 9 प्रतिशत से लगभग 24 प्रतिशत हो गए परन्तु पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी 23 प्रतिशत से अब लगभग 1.5 प्रतिशत रह गई है। क्या कोई व्यक्ति, जो इस कानून का विरोध करता है, वह बताएगा कि ऐसा क्यों हुआ? कारण स्पष्ट है कि वहाँ पर इस्लामिक देश होने के कारण अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहे थे, जिसके कारण कुछ को मार दिया गया, कुछ का धर्म परिवर्तन कर दिया गया तथा कुछ भारत में आ गए। जबकि महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू व अन्य नेताओं ने उसी समय कहा था कि यदि पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं और सिक्खों को सताया जाता है तो वे भारत में आकर रहने को स्वतंत्र हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वे अविभाजित भारत के ही रहने वाले हैं। मुस्लिमों पर ऐसा अत्याचार संभव नहीं है क्योंकि वे यहाँ से इच्छापूर्वक ही गए थे और पाकिस्तान एक इस्लामिक देश था ही। इसी प्रकार 1971 में पाकिस्तान पाक से अलग होकर बांग्लादेश बना। शेख मुजीब-उर-रहमान के प्रधानमंत्री बनने तक देश में सामान्य हालात रहे, परन्तु उनकी हत्या के उपरांत शीघ्र ही बांग्लादेश भी एक इस्लामिक देश बन गया। वहाँ पर भी गैर-मुस्लिमों के साथ सौतेला व्यवहार तथा धार्मिक उत्पीड़न प्रारंभ हुआ। जिसकी वजह से वहाँ से भी गैर-मुस्लिमों का भारत में आगमन हुआ। ठीक इसी प्रकार अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के समय पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे बामियान में विश्व की सर्वाधिक ऊँची बौद्ध की प्रतिमा को तोड़ दिया गया। जब प्रतिमा के साथ ऐसा हुआ तो आप समझ सकते हैं कि वहाँ पर गैर-मुस्लिमों के साथ कैसा होता होगा। अतः कुल मिलाकर इन तीन देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक व्यक्ति, जिनका धार्मिक आधार पर उत्पीड़न होने के कारण भारत में 31 दिसंबर 2014 तक आ गए थे उन सभी को नागरिकता देने के लिए यह कानून बना है।
3. किन किन व्यक्तियों व राजनैतिक पार्टियों ने इनके समर्थन में आवाज उठाई -
(i) बँटवारे के पश्चात् महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू इत्यादि काँग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं ने कहा था कि यदि पाकिस्तान में हिन्दू या सिख भाई असुरक्षित महसूस करते हैं तो कभी भी भारतवर्ष में आ सकते हैं। यह इसलिए कहा गया कि ये सभी लोग अविभाजित भारतवर्ष में रह रहे थे।
(ii) बीजेपी प्रारंभ से ही यह मुद्दा उठाती रही है तथा हमेशा इसे अपने घोषणापत्र में रखा।
(ii) 18 दिसंबर 2003 में विपक्ष के नेता के रूप में कांग्रेस पार्टी के डाॅ० मनमोहन सिंह ने संसद में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के समक्ष यह मुद्दा उठाया था कि इन गैर-मुस्लिमों को नागरिकता प्रदान की जाए।
(iv) भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने भी अपने एक पत्र के माध्यम से इनकी आवाज उठाई थी।
4. क्या नागरिकता संशोधन कानून पहली बार बना हैः समय-समय पर विभिन्न सरकारें विशेष परिस्थितियों के अनुसार नागरिकता संशोधन कानून लाईं।
(i) 1955 नागरिकता कानून।
(ii) 1971 में बांग्लादेशी मुसलमानों को शरणार्थी से नागरिकता दी गई।
(iii) 1985 में तमिलों को भारतीय नागरिकता।
उस समय भी इन लोगों की सुध नहीं ली गई तथा किसी भी राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति द्वारा यह नहीं पूछा गया जो अब पूछा जा रहा है कि केवल विशेष धर्म या जातियों को नागरिकता क्यों दी जा रही है?
भ्रमित किए जाने वाले कुछ प्रश्न -
प्रश्न 1. इस कानून से भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग किया जा रहा है?
उत्तर: नहीं, ऐसा नहीं है। यह कानून किसी भी धर्म के भारतीयों पर लागू नहीं होता।
प्रश्न 2. केवल तीन देश के अल्पसंख्यकों ही क्यों चुने गए? अन्य देश जैसे श्रीलंका, म्यामार, मालदीव इत्यादि क्यों नहीं?
उत्तर: इन तीन देशों के अल्पसंख्यक अविभाजित भारतवर्ष के ही नागरिक थे। इनका मामला सन 1950 से ही लंबित है तथा समय-समय पर सभी पार्टियाँ भी इनका समर्थन करती रही हैं। श्रीलंका के शरणार्थियों को सन् 1985 में विशेष कानून लाकर नागरिकता दी गई थी। म्यांमार व मालदीव में धर्म के आधार पर उत्पीड़न नहीं होता और उनके निवासी मूल रूप से भारतवर्ष के नहीं हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश देश इस्लामिक राष्ट्र हैं, इसलिए इनके द्वारा अल्पसंख्यकों पर किये गये धर्म के आधार पर उत्पीड़न को पूरे विश्व ने समय-समय पर देखा है।
प्रश्न 3. इस कानून से भारतीय मुसलमानों की नागरिकता वापस ली जा रही है या नागरिकता सिद्ध करनी पड़ेगी?
उत्तर: इस कानून से किसी भी धर्म के भारतीय नागरिक की नागरिकता वापस नहीं ली जा रही है और न ही किसी को नागरिकता सिद्ध करनी पड़ेगी।
प्रश्न 4. यदि इन तीनों देशों के सभी अल्पसंख्यकों जो कि लगभग 4 करोड़ हैं, भारतवर्ष में आ जायेंगे तो उन्हें कहाँ रखा जायेगा या हमारे संसाधनों में कमी नहीं आयेगी?
उत्तर: यह कानून केवल उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो 31 दिसम्बर 2014 तक धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारतवर्ष में आ चुके हैं।
प्रश्न 5. क्या संसद द्वारा पारित यह कानून असंवैधानिक है?
उत्तर: बहुत सारे लोग इस कानून के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में गये तथा सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे लगाने से मना कर दिया और सुनवाई के पश्चात् यह भी पता चल जायेगा कि यह संवैधानिक है या नहीं।
यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि किसी भी देश के किसी भी धर्म के व्यक्तियों को भारतवर्ष में नागरिकता प्रदान करने की सामान्य प्रक्रिया सतत् रूप से चल रही है जिसके अन्तर्गत इन्हीं देशों के लगभग 600 मुस्लिमों को भारतवर्ष में नागरिकता पिछले 5 वर्षों में गयी है तथा यह कानून विशेष परिस्थितियों में लाया गया कानून है।
उपरोक्त सभी बातों पर यदि विचार किया जाए और लोगों को दिग्भ्रमित कर हिंसा के लिए उकसाया जाए तो गलती किसकी है? कुछ राजनीतिक लोग, पार्टियाँ जिनका अस्तित्व समाप्ति की ओर है, उन्होंने ही विष-वमन कर देश को हिंसा में झुलसाया। यह आप पर छोड़ते हैं कि आप इन विचारों से सहमत हैं अथवा नहीं।
डाॅ॰ राजकुमार अग्रवाल
एसोसिएट प्रोफेसर (भौतिकी विज्ञान विभाग)
एस॰डी॰ (पी॰जी॰) काॅलेज, मुजफ्फरनगर।

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