तीखी नज़र "नारी सशक्तिकरण या अपमान" - By Ashok Kumar
अभी कुछ तात्कालिक घटनाएँ, जो उन्नाव और हैदराबाद में घटी, उन्हें सुनकर-जानकर मन बहुत ही खिन्न हुआ, शायद मेरा ही नही आप सभी का भी हुआ होगा। ऐसी घटनाएँ केवल इतनी ही हैं ऐसा नहीं है, हर रोज कहीं न कहीं, किसी ना किसी शहर में, गाँव में ऐसी घटनाएँ आम हो गयी हैं। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का हमारे समाज में इस तरह से बढ़ना एक बहुत ही भयावह स्थिति को जन्म दे रहा है। हमें यह देखना होगा और सोचना भी होगा, और ना केवल सोचना बल्कि सामाजिक स्तर पर बहुत बड़े सुधार के लिए कार्य करना होगा।
अब मैं जो लिख रहा हूँ, यह केवल मेरी व्यक्तिगत विचारधारा है और हो सकता है कि बहुत से लोग मेरे विचारों से सहमत न हो लेकिन जो मुझे लग रहा है कि गलत है और इसे बदलने या सुधारने की जरूरत है, उस पर बोलना या लिखना जरूरी है।
हम आज जैसे-जैसे आधुनिकता के दौर में बढ़ रहे हैं और जितनी तेजी से अपने मूल संस्कारों-विचारों से दूर हो रहे हैं वैसे-वैसे समाज अकल्पनीय अपराध को जन्म देते जा रहे हैं। आधुनिकता बहुत जरूरी है लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है कि आधुनिकता की तरफ तभी बढ़ा जा सकता है जब अपने मूल संस्कार को भुला दिया जाए।
हमारी संस्कृति और भारतीय परंपरा जिसकी उपासक रही "यत्र नार्यसते पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता", अर्थात जहाँ नारी की पूजा हो वहाँ देवता/ईश्वर का वास होता है। लेकिन आज क्या हो रहा है? उसी नारी का बाजारीकरण? हैं? ये बात सत्य है और मैं इसका समर्थक भी हूँ कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहियें, लेकिन यह बात समझ मे नहीं आती कि आज के सभी फिल्मी विज्ञापनों में महिलाओं को जिस तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा है उसे हम क्या मानें? नारी सम्मान या नारी अपमान? मैं ये नहीं कहता कि यह कोई कारण है महिलाओ के प्रति बढ़ते अपराध का, लेकिन इतना जरूर है कि इसे मैं महिला का सम्मान या सशक्तिकरण भी नहीं मानता। किसी पुरुष के प्रयोग में आने वाली सामग्री चाहे डियोडरेन्ट, शैम्पू, फेसवाॅश, आॅयल या अन्डरगारमेन्ट्स तक के लुभावने विज्ञापनों में जैसे महिलाओं को प्रस्तुत किया जाता है और पुरुषों को बताया जाता है कि कैसे उन सामग्री के प्रयोग से महिलाएँ आकर्षित होती हैं, इसे मैं एक वैचारिक अपराध जरूर कहूँगा।
दूसरी बात, क्या हमारी बेटियों के लिए उनके आदर्श फिल्मी जगत के ही सितारे रह गए हैं? हम अपनी बेटियों की परवरिश में ऐसा क्यों नहीं करते कि उनके लिए आदर्श रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती या पन्नाधाय जैसी वास्तविक सशक्त महिलाएँ हां,े जिन्होंने आत्म-सम्मान को बचाने के लिए किसी का वध करने में अपने साहस का जो परिचय दिया उसे हम आज भी याद रखते हैं। लेकिन हम आधुनिक समाज में इतने मस्त और व्यस्त है कि हमारे पास बेटियों के लिए आदर्श ऐसी महिलाएँ या पुरुष ही शेष हैं जिनके ईमान-धर्म का उनको खुद ही पता नहीं।
अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू पर। पुरुष प्रधान समाज में आज कुछ बेशर्म लोग महिलाओं के प्रति ऐसी भावना रख रहे हैं और इतनी आपराधिक मानसिकता के हो गए हैं, जिन्हें यह तक याद नहीं रहा कि उनके संसार में आने का रास्ता महिला ही है, जो उसे उसकी माँ के रूप में मिली और वह बेगैरत महिला को केवल भोग की वस्तु समझ कर उसके जीवन को तार-तार करने में लग गया है।
मुझे लगता है बेटियों से ज्यादा अनुशासन अब बेटों के पालन-पोषण पर लगाना होगा। बेटों की परवरिश ऐसी करनी होगी कि बड़े होकर महिलाओं को सम्मान दे सके। सरकार और प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी बहुत अहम है, लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि बलात्कार या महिलाओं के प्रति किसी भी अपराध में समाज की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। समाज की मानसिकता और परवरिश पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।
इन सभी बातों से मैं कहीं भी ये सिद्ध नहीं करना चाहता कि सारी गलती समाज की है या किसी एक विशेष वर्ग की, लेकिन इतना जरूर है कि ऐसे अपराध जो समाज मे कैंसर की तरह हैं, उन्हें रोकने के लिए हर स्तर पर काम करने की जरूरत है और सरकार और प्रशासन को और भी अधिक कठोर कदम उठाने के लिए भी बाध्य किया जाना चाहिए।
अब मैं जो लिख रहा हूँ, यह केवल मेरी व्यक्तिगत विचारधारा है और हो सकता है कि बहुत से लोग मेरे विचारों से सहमत न हो लेकिन जो मुझे लग रहा है कि गलत है और इसे बदलने या सुधारने की जरूरत है, उस पर बोलना या लिखना जरूरी है।
हम आज जैसे-जैसे आधुनिकता के दौर में बढ़ रहे हैं और जितनी तेजी से अपने मूल संस्कारों-विचारों से दूर हो रहे हैं वैसे-वैसे समाज अकल्पनीय अपराध को जन्म देते जा रहे हैं। आधुनिकता बहुत जरूरी है लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है कि आधुनिकता की तरफ तभी बढ़ा जा सकता है जब अपने मूल संस्कार को भुला दिया जाए।
हमारी संस्कृति और भारतीय परंपरा जिसकी उपासक रही "यत्र नार्यसते पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता", अर्थात जहाँ नारी की पूजा हो वहाँ देवता/ईश्वर का वास होता है। लेकिन आज क्या हो रहा है? उसी नारी का बाजारीकरण? हैं? ये बात सत्य है और मैं इसका समर्थक भी हूँ कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार मिलने चाहियें, लेकिन यह बात समझ मे नहीं आती कि आज के सभी फिल्मी विज्ञापनों में महिलाओं को जिस तरह से प्रस्तुत किया जाने लगा है उसे हम क्या मानें? नारी सम्मान या नारी अपमान? मैं ये नहीं कहता कि यह कोई कारण है महिलाओ के प्रति बढ़ते अपराध का, लेकिन इतना जरूर है कि इसे मैं महिला का सम्मान या सशक्तिकरण भी नहीं मानता। किसी पुरुष के प्रयोग में आने वाली सामग्री चाहे डियोडरेन्ट, शैम्पू, फेसवाॅश, आॅयल या अन्डरगारमेन्ट्स तक के लुभावने विज्ञापनों में जैसे महिलाओं को प्रस्तुत किया जाता है और पुरुषों को बताया जाता है कि कैसे उन सामग्री के प्रयोग से महिलाएँ आकर्षित होती हैं, इसे मैं एक वैचारिक अपराध जरूर कहूँगा।
दूसरी बात, क्या हमारी बेटियों के लिए उनके आदर्श फिल्मी जगत के ही सितारे रह गए हैं? हम अपनी बेटियों की परवरिश में ऐसा क्यों नहीं करते कि उनके लिए आदर्श रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती या पन्नाधाय जैसी वास्तविक सशक्त महिलाएँ हां,े जिन्होंने आत्म-सम्मान को बचाने के लिए किसी का वध करने में अपने साहस का जो परिचय दिया उसे हम आज भी याद रखते हैं। लेकिन हम आधुनिक समाज में इतने मस्त और व्यस्त है कि हमारे पास बेटियों के लिए आदर्श ऐसी महिलाएँ या पुरुष ही शेष हैं जिनके ईमान-धर्म का उनको खुद ही पता नहीं।
अब आते हैं सिक्के के दूसरे पहलू पर। पुरुष प्रधान समाज में आज कुछ बेशर्म लोग महिलाओं के प्रति ऐसी भावना रख रहे हैं और इतनी आपराधिक मानसिकता के हो गए हैं, जिन्हें यह तक याद नहीं रहा कि उनके संसार में आने का रास्ता महिला ही है, जो उसे उसकी माँ के रूप में मिली और वह बेगैरत महिला को केवल भोग की वस्तु समझ कर उसके जीवन को तार-तार करने में लग गया है।
मुझे लगता है बेटियों से ज्यादा अनुशासन अब बेटों के पालन-पोषण पर लगाना होगा। बेटों की परवरिश ऐसी करनी होगी कि बड़े होकर महिलाओं को सम्मान दे सके। सरकार और प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी बहुत अहम है, लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि बलात्कार या महिलाओं के प्रति किसी भी अपराध में समाज की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए। समाज की मानसिकता और परवरिश पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है।
इन सभी बातों से मैं कहीं भी ये सिद्ध नहीं करना चाहता कि सारी गलती समाज की है या किसी एक विशेष वर्ग की, लेकिन इतना जरूर है कि ऐसे अपराध जो समाज मे कैंसर की तरह हैं, उन्हें रोकने के लिए हर स्तर पर काम करने की जरूरत है और सरकार और प्रशासन को और भी अधिक कठोर कदम उठाने के लिए भी बाध्य किया जाना चाहिए।
- अशोक कुमार (गुड़गाँव)

धन्यवाद विपुल भाई !
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आपको हमें नहीं बल्कि हमें आपको बोलना चाहिए। आपका बहुमूल्य लेख हमें मिला, आपके आभारी रहेंगे।
हटाएंसोए हुए समाज को जागरूक करने योग विचार और प्रति एक व्यक्ति को दर्पन दिखता आपका लेख, अशोक जी आपको हमारा नमन 🙏
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