ये मन परिंदा हुआ जाए - By Rv Singh Rajput
ये मन परिंदा हुआ जाए, बेताब है उड़ जाने को
बंदिशों से दूर बहुत दूर, कुछ कर गुजर जाने को
चाहे कड़ी धूंप में तन झुलसाने वाली हवा
या फिर चाहे कोई तूफान-ए -बरिशे हों
ना फ़िक्र अब कोई बचकाने अहसासों की
अब सिर्फ मैं और ये खुला आसमाँ हो
ये मन परिंदा हुआ जाए, बेताब है उड़ जाने को
बंदिशों से दूर बहुत दूर, कुछ कर गुजर जाने को
गर कभी थक गया जो मैं, ये मन में अब डर नहीं
घुटन भरी खुशहाली से, वो राह बेहतर है कहीं
नादान सी ख्वाईसें हैं, टेढ़ी मेढ़ी डगर है
ना रुक जाऊं कभी, मेरी हर साँस उड़ानों में हो
ये मन परिंदा हुआ जाए, बेताब है उड़ जाने को
बंदिशों से दूर बहुत दूर, कुछ कर गुजर जाने को
- रामवीर सिंह राजपूत
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