चले कहाँ? - By Vipul Rajput 'Mahiyan'
एक अभागे पिता महाराजा दशरथ अपने पुत्र श्री राम के वियोग में कह रहे हैं उसे मैंने गीत का रूप देने का प्रयास किया है। पसन्द आये तो जरूर बताना...
चले कहाँ? चले कहाँ?
अपना सब कुछ छोड़कर
मेरा सब कुछ ले चले...
चले कहाँ? चले कहाँ?
याद है आता, आज वो एक दिन,
अंधे मात पिता का शरवन,
बिना ही सोचे समझे मैंने,
छोड़ा था जब बाण को अपने,
एक क्षण में ही श्रवण गिरा था,
मात पिता ने श्राप दिया था,
लगे है शाप ही वार चले...
चले कहाँ? चले कहाँ?
पुत्र प्रेम से मैं हूँ अभागा,
टूटा जैसे पतंग का धागा,
क्या सोचा था, और क्या हुआ है,
सब केकई जालिम ने किया है,
मेरे वचन ही खा गये मुझको,
वन में भेजा राम ऐ तुमको,
खत्म है सब जो छोड़ चले...
चले कहाँ? चले कहाँ?
स्वरचित - विपुल राजपूत ‘माहियान’

Very beautiful sir
जवाब देंहटाएंVery nycccccccc
हटाएंSundar
जवाब देंहटाएंTouching, 👏👏👌👏👌
जवाब देंहटाएंBahut sunder rachana
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